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मैं वज्रपात कर जाऊँगा

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मैं मृत्यु  का  बन के  चारण अब सबको सत्य बताऊँगा रौद्र   रूप   कर   मैं  धारण अब  समर  कराने आऊँगा अश्रुकण  को  मैं भाप  बना अब  घोर घात  करने आया वरदान जहाँ अभिशाप बना मैं   वज्रपात   करने   आया क्यों  मेरी  कविता  मौन रहे? शब्दों  से  युद्ध  करूँगा अब क्यों  रौद्र  भावना  गौण रहे? अश्कों को क्रुद्ध करूँगा अब कर्मठ  यौवन  सीमा  पर  है रक्तिम  सावन  सीमा  पर है कुछ  राम  दिखाई  पड़ते  हैं लाखों  रावण  सीमा  पर हैं वो लहू  बहाते  सरहद  पर कुछ  घर  में  बैठे  हंसते हैं  वीरों  को  मौत  नहीं आती वो   अमरत्व  में   बसते  हैं एक  बेटा  माँ  का मरता है है आँचल  सूना  हो  जाता पछताता भाग्य पर हूँ अपने उस  माँ का  बेटा हो पाता! सीने  पर ...