आजादी- गाथा
. ।।आजादी- गाथा।।
✍️ विरेन्द्र शर्मा “अनुज”
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(1)
ऐ मेरे वतन के लोगों,
ना करो कोई नादानी।
मुश्किल से मिली आजादी,
फेरो ना उस पर पानी।
(2)
तैतीस कोटि क्षुब्ध हृदय ने,
जब अपने मन में ठानी।
तब जाकर मिली आजादी,
न जाने कितनों ने दी कुर्बानी।
(3)
व्यापार का झांसा देकर,
फिरंगी धरा में अपनी आए।
हम भोले भाले लोगों को,
झूठी दिवा स्वप्न दिखा भरमाए।
(4)
पांव धीरे धीरे अपना फैलाया,
सब राजाओं को भरमाया।
लालच देकर किसी को साधा,
तो किसी को बल से धमकाया।
(5)
हम जाति धर्म के नाम बंटे है,
इस सत्य को उन्होंने भांपा।
राजाओं में फूट डाला जमकर,
एक एक कर के सबको नापा।
(6)
राजे महराजों को मित्र बनाकर,
जाम उनके साथ छलकाई।
जनता बेचारी कराह रही,
उन पर कभी दया ना आई।
(7)
कर के बोझ से इतना लादा,
जरूरी चीजों में भी कर चिपकाया।
खेती में पानी में गौ चारे में कर,
Aयहां तक नमक में भी कर लगाया।
(8)
भूमि में हमारी ही आकर हमको,
दोय्यम दर्जे की प्रजा बनाया।
श्रमिकों के नंगे जिस्मों में,
जब चाहा कोड़े बरसाया।
(9)
क्रांतिकारियों ने बीच-बीच में,
विद्रोह का बिगुल बजाया।
पर गोरों ने बड़ी नृशंषता से,
हर विद्रोह को बल से निपटाया।
(10)
फिरंगी इतने कैसे घुस पाए,
जब मूल कारणों पर दृष्टि फिराया।
तब एक ही कारण प्रमुखता से,
कवि “अनुज” की समझ में आया।
(11)
जैसे कुएं के मेढक होते हैं,
वैसे राजा सब मस्त पड़े थे जी।
अपने साम्राज्य के आगे बौना,
सब राजाओं को करने अड़े थे जी।
(12)
हम नवाब हैं हम से बेहतर,
और भला कोई क्या होगा।
अंग्रेजी हुकूमत है मित्र हमारे,
हम से श्रेष्ठ भला कोई क्या होगा।
(13)
सब बटे हुए थे अपने में,
ना आपस में भाई चारा था।
सब ओर से उचित अवसर पाकर,
अंग्रेजों ने पैर पसारा था।
(14)
सत्रह सौ संतावन में पहली बार,
अंग्रेजों ने प्लासी का युद्ध लड़ा।
सिराज उद्दौला थे नवाब बंगाल के,
रण भूमि में उनको हरा दिया।
(15)
नवाब पड़ गया था अकेला तब,
कोई भी साथ नहीं आया।
बढ़ा हौसला गोरों का फिर,
बक्सर जंग में भी परचम लहराया।
(16)
बंगाल बिहार उड़ीसा का अंग्रेजों ने,
दीवानी अधिकार किया हासिल।
विस्तार साम्राज्य अपना करने का,
शायद यहीं से साधा था मंजिल।
(17)
पर इतनी आसान न थी मंजिल,
मराठों से भिड़ना बाकी था।
चबवाए चने लोहे के वीर मराठों ने,
मार्ग उनका दृढ़ता से रोका था।
(18)
मैसूर के नवाब ने सबसे पहले,
गोरों को घुटने टिकवाया था।
पर पोर्टो नोवो के घमासान में,
अंग्रेजों ने ताकत दिखलाया था।
(19)
टीपू सुल्तान ने जंग सम्हाला तब,
जंग में निरंतर शौर्य दिखलाया।
नाक में दम कर दिया गोरों के,
दीवानी फिर से वापस पाया।
(20)
बीस वर्षों तक नया साम्राज्य कोई,
अंग्रेज न हासिल कर पाए।
पर तीसरे युद्ध में परास्त कर टीपू को,
कब्जा मैसूर में हासिल फिर पाए।
(21)
अठारह सौ छप्पन के आते तक,
पूरे भारत में अंग्रेजों का कब्जा था।
भारत वंशियों को पीड़ित करने का,
कोई मौका ना उन्होंने छोड़ा था।
(22)
अठारह सौ सत्तावन में पहली दफा ,
भारत की सेना ने खुल कर विद्रोह किया।
धधक उठी तब मेरठ की सड़कें,
जाकर दिल्ली में झंडा फहराया।
(23)
मंगल पांडे की अगुआई में भीषण,
गदर बैरकपुर में फैल गया।
उनके बंदूकों ने ऐसी चिंगारी उगली,
अंग्रेजी खेमा भीतर से दहल गया।
(24)
विद्रोह की सजा तो मिलनी थी,
मंगल पांडे फांसी में झूल गए।
पर शहादत से अपनी अंग्रेजों के,
कर अंदर तक गहरी शूल गए।
(25)
ऐसे विद्रोहों को दमन करने,
अंग्रेजों ने नया पैंतरा अपनाया।
ईस्ट इंडिया कंपनी की कर दी छुट्टी,
और ब्रिटिश एक्ट भारत लाया।
(26)
विद्रोह ने क्रांति का रूप लिया,
पूरा उत्तर भारत आया घेरे में।
कंवर सिंह ने लिया मोर्चा बिहार में,
भक्त खान ने कमान संभाला दिल्ली में।
(27)
कानपुर में नाना साहेब व तात्या टोपे,
तो उधर झांसी में लक्ष्मी बाई अड़ी।
सिक्खों ने यूपी में किया सिंहनाद,
छीन लिया अंग्रेजों से लखनऊ की गद्दी।
(28)
लक्ष्मीबाई की कुर्बानी ने तो,
महासमर का दिया था संदेशा।
पर अन्य कई राजाओं ने भय से,
दिया ना साथ, जिसका न था अंदेशा।
(29)
बहादुर शाह जफर की अगुवाई में,
वीर सपूतों ने गोरों से खूब लड़ा।
पर अग्रेजों के पास बड़ा बल था,
साल के अंदर किया साम्राज्य खड़ा।
(30)
फिरंगियों ने भले ही असीमित बल से,
उठते आंदोलन को कुचल दिया।
पर स्वराज की चिंगारी अब तक,
हर दिल के भीतर कौंध गया।
(31)
ना उम्मीद होकर राजाओं से,
देश के बुद्धिजीवी लोग आगे आए।
क्या वकील डॉक्टर इंजीनियर,
संगठन के पटल में सब आए।
(32)
अठारह सौ पच्यासी में पहली बार,
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन हुआ।
डब्लू सी बनर्जी की अध्यक्षता में,
पुनः स्वतंत्रता संग्राम का सृजन हुआ।
(33)
पूछो ना फिर बड़े बड़े नेताओं का,
जमघट दिन ब दिन लगा जुड़ने।
दादा भाई नैरोजी सुरेंद्र नाथ बनर्जी,
एफ शाह मेहता,गोपाल कृष्ण गोखले।
(34)
पहली बार सभी विद्वजनों ने मिलकर,
बुलंदी से आवाज उठाया था जमकर।
अंग्रेजों की भारत पर शासन करने की,
वैधानिकता को ललकारा था खुलकर।
(35)
उन्नीस सौ छै में कांग्रेस तब,
पहली बार स्वराज का आह्वान किया।
संविधान के अंतर्गत रहते,
स्थानीय सरकार बनाने का मांग किया।
(36)
ऐसी मांग अंग्रेजों को पचती कैसे,
लोकमान्य तिलक को गिरफ्तार किया।
दमनकारी नीति अपनाते हुए तिलक को,
देश निकाला कर बर्मा भेज दिया।
(37)
अपनी दमनकारी नीतियों से,
जुल्म अंग्रेजों ने नित्य जारी रक्खा।
तरह तरह के भेद डाल कर,
नेताओं को अलग अलग रक्खा।
(38)
उन्नीस सौ अठारह में फिर आए गांधी जी,
संघर्ष को नया आयाम मिला।
सारे धड़क एक मंच पर आए,
सत्य अहिंसा अमोघ वरदान मिला।
(39)
इसी बीच संघर्ष पटल पर,
नेहरू सुभाष भी कूद पड़े।
ऐशो आराम का छोड़ जीवन,
अंग्रेजों से लड़ने जूझ पड़े।
(40)
उन्नीस सौ बीस में बापू ने,
असहयोग आंदोलन का सूत्रपात किया।
अंग्रेजी हुकूमत की हिल गई नींव,
पर अत्याचार में न कोई ढील दिया।
(41)
उल्टे कर थोपा नमक पर भी,
नेताओं को जेलों में ठूंस दिया।
तब उन्नीस सौ तीस में गांधी ने,
ऐतिहासिक दांडी मार्च किया।
(42)
अपने हाथों से खुद नमक बना,
सविनय अवज्ञा आंदोलन फूंक दिया।
गिरफ्तार हुए गांधी जी भी पर,
क्रांति की आग जन जन तक पहुंच गया।
(43)
क्या हिंदू मुस्लिम क्या सिक्ख भाई,
क्या दलित क्या ग्रामीण माई।
निकल पड़े सब घरों से अपने,
आजादी की बुलंद गुहार लगाई।
(44)
कितने कोड़े कितने डंडे,
न जाने कितनी लाठियां थी खाई।
स्वराज का नशा चढ़ा ऐसा कि छोड़,
विदेशी सिर्फ स्वदेशी वस्तु ही अपनाई।
(45)
सरकारी नौकरियों को त्याग तिनके सा,
सब बन गए आजादी के परवाने।
फांके मस्ती की नौबत भी आई,
पर हार कहां क्रांतिकारी मन माने।
(46)
संघर्ष सहर्ष अपनाया सबने,
साहस न जाने कहां से थी आई।
बच्चे बूढ़े नर नारी सब ने ,
अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति दिखलाई।
(47)
जितना अधिक दमन अंग्रेजों का,
दिन पर दिन था बढ़ता जाता।
उतनी ही संघर्ष की शक्ति,
जन मन के भीतर भरता जाता।
(48)
मजबूत संदेश दिया गोरों को चाहे,
विश्व में तुम्हारा डंका बजता हो।
तुम्हारी शक्ति के आगे भले ही,
विश्व का झंडा झुकता हो।
(49)
पर भारत का ध्वज ये प्यारा,
अब कभी नहीं झुकने वाला।
अब तो लाल किले पर चढ़कर,
फहरा के रहेंगे तिरंगा प्यारा।
(50)
सुनो फिरंगियों तुम्हारे पापों के,
भर गया अब घड़े का पानी है।
सहेंगे ना अब अत्याचार तुम्हारा,
ना चलने देंगे तेरी मनमानी है।
(51)
जुल्म ढाए क्या क्या तुमने,
गिन उन्हें कभी ना पाऊंगा।
पर इतना तो तय है,
जीवन भर उन्हें भूल ना पाऊंगा।
(52)
न जाने कितने मांग उजड़ गए,
कितनी माताओं ने अपना बेटा खोया।
अनाथ हुए बच्चे कितने,
कितनों ने अपना सब कुछ खोया।
(53)
भूख से ही प्राण त्यागा कितनों ने,
कितनों ने अनगिनत खाए कोड़े।
जेल में आजीवन घुटते रहे कितने,
यातनाओं से कितनों ने दम थे तोड़े।
(54)
जागी तब भारत की तरुनाई,
हर तरफ से छिड़ी लड़ाई थी।
भगतसिंह राजगुरु सुखदेव ने तब,
घुसकर असेंबली में बम बरसाई थी।
(55)
बदले में अंग्रेजों ने, दिया फांसी उनको,
वे हंसते हंसते, फंदों में झूल गए।
वंदे मातरम का स्वर, अनंत आकाश में,
ऐसा गूंजा, कि लोग गुलामी भूल गए।
(56)
लूटे लिए खजाने अंग्रेजों के,
छकाया उनको पल-पल छिन-छिन।
आजाद थे! आजाद ही रहेंगे!
बोले चंद्रशेखर आजाद और बिस्मिल।
(57)
सबके मन में बड़ा उबाल आया,
मानो भारत में कोई भूचाल आया।
क्रांति ने अपना रंग दिखलाया,
तब क्षेत्रीय स्वराज संबंधी कानून आया।
(58)
उन्नीस सौ पैंतीस में राज्यों में चुनाव हुए,
सभी राज्यों में कांग्रेस का विजय हुआ।
राज्यों में अपनी सरकार बनी,
पर सरकार ज्यादा दिन नहीं चली।
(59)
सन उनतालिस में वो दिन आया,
द्वितीय विश्व युद्ध पटल पर मंडराया।
सब मंत्रियों ने त्यागा पद अपना,
स्वराज फिर से बन गया सपना।
(60)
सन इकतालीस में नेता सुभाष की,
गिरफ्तारी का अंग्रेजों ने फरमान दिया।
पर हाथ न आए जर्मनी पहुंचे,
वहां आजाद हिंद फौज का गठन किया।
(61)
सन बयालीस में गांधी जी ने,
“भारत-छोड़ो” का अंतिम दिया नारा।
“करो या मरो” आह्वान था उनका,
खुले विद्रोह का भर दिया हुंकारा।
(62)
गांधी जी की एक पुकार से,
जन सैलाब सड़कों पर आया।
मुश्किल हुआ अब शासन करना,
अंग्रेजों का मन भी भरमाया।
(63)
विश्व युद्ध शांत हुआ जब,
लेबर पार्टी ब्रिटिश सत्ता में आया।
रवैया उनका कुछ नर्म रहा,
उनका प्रतिनिधि तब भारत आया।
(64)
अंग्रेजो की पहल से प्रथम अधिकृत,
भारत में स्वराज का प्रस्ताव आया।
नेहरू जी की अगुआई में तब,
अंतरिम सरकार था बन पाया।
(65)
पर मुस्लिम लीग के नेताओं ने,
उस व्यवस्था में अपना स्वार्थ साधा।
अंतरिम सरकार का किया विरोध,
और बटवारे में पाकिस्तान मांगा।
(66)
ये पहले से जग जाहिर था,
गोरों का चेहरा गोरा दिल काला था।
जाते जाते भी खेल गए,
बटवारे का दंश हम झेल गए।
(67)
पर अंततः वह शुभ दिन आया,
कुर्बानियां शहीदों की रंग लाया।
पूर्ण स्वराज मिला भारत को,
लाल किले पर तिरंगा लहराया।
(68)
पंद्रह अगस्त का वह दिन स्वर्णिम,
आजाद भारत ने ली अंगड़ाई थी।
बूढ़े भारत के रग- रग में,
फिर से छाई तरुणाई थी।
(69)
पर अग्रेजों ने जाने से पहले,
दो सौ वर्षों तक देश को चूसा था।
पाई- पाई ले गए लूटकर,
राजकोष में केवल भूसा था।
(70)
बड़ी कठिन परीक्षा थी वह,
देश कैसे आगे बढ़ पाएगा।
भूख प्यास गरीबी का साया,
कब तक सर पे मंडराएगा।
(71)
तब देश भक्ति की स्पंदन ने ही,
सबको था दिया बड़ा संबल।
जुट गए सभी प्राण-प्रण से,
कर्मयोग की धारा, बही अविरल।
(72)
देश की जनता, और नेताओं ने,
उद्यमता के जो मानदंड गढ़े।
विज्ञान कृषि उद्योग जगत में,
नए नए आयाम चढ़े।
(73)
आज पूरी दुनिया हतप्रभ है,
तिरंगा विश्व पटल पर है।
गणतंत्र का हीरक वर्ष मन चुका,
प्रजातंत्र अपनी शिखर पर है।
(74)
जो मिला उसे अखंड रखना,
अब हम सब की जिम्मेदारी है।
राष्ट्र गौरव ही सर्वोपरि हो,
राष्ट्र से ही शान हमारी है।
(75)
भूल शहीदों की कुर्बानी,
पुरानी गलतियां जो फिर दोहराएंगे।
आपस में बंटेंगे कटेंगे तो कैसे,
आजादी हम अक्षुण्ण रख पाएंगे।
(76)
उत्कट प्रेम हो मातृभूमि पर,
तत्पर रहो सदा, मर मिटने को।
प्रजातंत्र का भव्य, तिरंगा शान से,
क्षितिज में, उन्मुक्त सदा फहरने दो।
🇮🇳 जय हिंद! जय भारत !! ❤️
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