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कन्हैया कुमार की कविताएं लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

हुंकार गणतंत्र की

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***हुंकार गणतंत्र की*** प्रचंड तेज-पुंज जो कराल काल को निगल गया, अखंड राष्ट्र का विहान शत्रु-दंभ को कुचल गया। विराट वज्र-घोष से दिगंत आज गूँजता, स्वतंत्र शौर्य-रक्त से स्वदेश-पथ जो अर्चता। नमन उन्हें, जिनका लहू पावन धरा को सींचता, अदम्य साहसी जो स्वयं ही काल-चक्र को खींचता। प्रखर पुरुषार्थ से वही नियति का मुख मोड़ता, शत्रु-दल के दर्प को जो पल-भर में ही मरोड़ता। वह प्रचंड भुजदंड जो पर्वत-शिखर को तोड़ता, अमर गाथा राष्ट्र की निज रक्त से जो जोड़ता। त्याग का वह शिखर जो झुकने न देता भाल को, चुनौती बन खड़ा जो घेरता प्रतिकाल को। धमनियों में गूँजती जो क्रांति की हुंकार है, वही तो इस वतन के शौर्य का आधार है। विजेता वह, जिसे न भय मरण का त्रास दे, जो धरा के कण-कण में विजय का विश्वास दे। कोटि-कोटि कंठ में जो राष्ट्र-भक्ति जगा रहा, अमरत्व की राह पर जो पग निरंतर बढ़ा रहा। शीश अर्पण कर चुका जो भारती के मान में, अमिट जिसकी कीर्ति है जन-गण-मन के गान में। सत्य का संधान कर जो लक्ष्य को ही भेदता, वह वीर ही तो राष्ट्र का उज्ज्वल भविष्य उकेरता। यही विधान की शक्ति जो जन-मन भाग्य सँवारती, अमर रहे यह तंत्र जो अख...

श्री राम कथा

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*******" श्री राम कथा ******* चैत्र मास की नवमी आई, लेकर अद्भुत उजियारा, राजा दशरथ के घर जन्मे, श्री राम लला प्यारा । गाए देव गण और ऋषि मुनि, बधाई के मंगल गीत, जन मानस सब झूम रहे थे, सुन खुशियों भरा संगीत। शिक्षा प्राप्ति हेतु गुरु विश्वामित्र के पास गए, सब सीख कला कौशल, शिष्य वह खास बने। किया ताड़का सुबाहु वध, ऋषियों का संताप हरा, किया अंत इन असुरों का, धरती से पाप छटा । आए राम-लक्ष्मण गुरु विश्वामित्र के संग, जनकपुर की नगरी में थी चारों ओर उमंग। सीता स्वयंवर की बात सुनी, शर्त थी बहुत ही भारी, शिव धनुष जो उठाएगा, होगी उनकी सीता प्यारी। भूपत आए देश-देश से, दिखाने बल पौरुष भारी, पर धनुष धरा पर धरा रहा , जनक हुए चिंताकुल भारी। बोले विदेह व्याकुल होकर, क्या वीर-विहीन हुई धरती सारी? नतमस्तक बैठे हो सब, क्या वैदेही रहेगी आजन्म कुँवारी? बातें इनकी सुन लक्ष्मण गरजे, सुनिए हे मिथिलेश ! बालपन में ऐसे अनेकों धनुष तोड़े हमने, यह धनुष नहीं कुछ विशेष। ऐसी वाणी ना बोलिए, बैठे हो श्री राम जहाँ, धनुष तोड़ना तो कुछ नहीं, ब्रह्माण्ड उठा सकता हूँ यहाँ। श्रीराम ने क्रोध उनका शांत कर, गुरु विश्वामित्र...

अर्जी सुन लो राम

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मेरी अर्जी सुन लो राम, मेरा जीवन सफल कर दो। संग-संग चल लो राम, मेरी राह सरल कर दो। पापी हूँ मैं, अधमी हूँ, प्रभु, तेरा ही सहारा है। ना आस रहा जग का, सब कुछ ही दिखावा है। मेरी नाव डूबी मझधार, प्रभु, आके बचा लेना। हे कृपा सिंधु दाता, जग के पालन कर्ता। कभी धैर्य ना खोयें हम, बस पकड़ें धर्म रस्ता। आहत हूँ जग से, तेरा ही सहारा है। शिव धनुष भंग करके, प्रभु सीता संग ब्याह रचा। नहीं कोई था जग में, जो धनुष उठा सका। न तुमसा कोई वीर, ना कोई ज्ञानी होगा। शबरी के बेर का मीठापन, तुमसे है भगवन। केवट का ज़िद्दीपन, तुमसे है भगवन। मेरी नैया पार लगाओ प्रभु, बड़ी दूर किनारा है। रख मान वचन का तुम, वन-वन भटके हो राम। सहनशील और त्याग में, अग्रणी हो राम। मर्यादित रहकर तुम, मर्यादा सिखाते हो। कर बाली का अंत, मित्रता का मिसाल दिया। मृत शीला को जिला करके, अहिल्या का उद्धार किया। मेरे अधर में अटके प्राण, प्रभु, आके बचा लेना। पंछी का कलरव तुमसे, बगिया में महक तुमसे। है चांद में शीतलता, सूरज में तपन तुमसे। जिस ओर नज़र जाता,तेरा ही नज़ारा है। अब तेरे सिवा रघुवर , कोई ना हमारा है।

राम-केवट मिलन

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***राम-केवट मिलन*** देखी थी प्रभु की सूरत, कच्छप रूप में हमने। पर छू न पाया चरण मैं उनके युगों तक वो भाव पला अन्तर्मन में। भाव भरे जो सृष्टि के आरंभ में, कूर्म रूप में ना मिल पाया। युगों तक तप करके केवट रुप में जन्म लिया। आज देखूंगा उनकी सूरत, वह कैसा मंजर होगा?  राम लला के दर्शन होंगे, वह पल कितना सुंदर होगा? जिनके चरणों में स्वर्ग बसा है और मुख में ब्रह्मांड जहाँ। उन चरणों की सेवा से बढ़कर, ना कोई सम्मान यहाँ। सुना है आपके चरणों में, भेद अनेकों छिपे हुए। पत्थर भी नारी बन जाती, स्पर्श मात्र से प्रभु तेरे। हे रघुवर! मैं तो अकिंचन! तरिणी-तरंगिणी में खेता हूँ। कुटुंब जनों का इससे ही, पालन-पोषण करता हूँ। तेरे चरण रज पड़ने से, कहीं नाव मेरी नारी बन जाए। है भारी एक का पालन करना, दो-दो नारी कौन संभाले? हे राम! पहले पद पंकज प्रक्षालूँ, तभी सरिता पार करूंगा। युगों तक की है प्रतीक्षा जिनकी, वह इच्छा तो पूर्ण करूंगा। इनके दर्शन की खातिर, ऋषि-मुनि वर्षों तप करते। वो स्वयं आज चल कर आए, उनको छोडूं कैसे? मन ही मन केवट सोचे, माँ गंगे! एक विनती सुन लो मेरी। विस्तार करो तुम जल क्षेत्र का, तट ही ना ...

"युवान" आए हैं

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  साथ तो है परिवार का, दोस्तों का, सहकर्मीयों और अपनों का। भाग दौड़ में जिंदगी व्यस्त नही अस्त व्यस्त है, आखिर पीछा जो कर रहे हैं सपनों का । इस जिंदगी की दौड़ में, तभी मिली एक छांव। जब नन्हें मेहमान के, घर में पड़े पांव। जिंदगी को सुकून का मरहम लग गया। दिन तो यूं गुजरने लगे मानो, पर लग गया। उसकी हर मुस्कान से जिंदगी में रंग यूं भरा हुआ, मानो सूने बादल में इंद्रधनुष हो बना हुआ। संदेशे बांटने खुशियों के नन्हें मेहमान आए हैं, हम खुश हैं आज बहुत मेरे घर "युवान" आए हैं।