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लिपटा रहूं चरणों में भगवन

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  लिपटा रहूं चरणों में भगवन =============== लिपटा रहूं चरणों में भगवन, जपता रहूं तेरा नाम प्रभु। रोजी रोटी यही हो भगवन, यही हो मेरा काम प्रभु। नींद से जागूं , नींद में जाऊं, जल पीऊं या खाना खाऊं, दौड़ रहा हूं जग के जाल में, करता रहूं तेरा ध्यान प्रभु। लिपटा रहूं चरणों में भगवन, जपता रहूं तेरा नाम प्रभु। श्वास श्वास में राम बसे हों, रोम रोम में श्याम बसे, प्राण पिता परमेश्वर मेरे, मन मंदिर हरि द्वार प्रभु। लिपटा रहूं चरणों में भगवन, जपता रहूं तेरा नाम प्रभु। पथ में अगर चलूं मैं भगवन, राम श्याम विश्राम प्रभु, मंजिल एक हो, लक्ष्य हो मेरा, नाम करूं गुणगान प्रभु। लिपटा रहूं चरणों में भगवन, जपता रहूं तेरा नाम प्रभु। रचनाकार भारत भूषण श्रीवास्तव

मेरे दोस्त बस यही तो जिंदगानी है

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मेरे दोस्त बस यही तो जिंदगानी है। ---------------------------------- कभी मस्ती तो कभी गुमसुम कहानी है, मेरे दोस्त बस यही तो जिंदगानी है। कभी आशा की किरण चमके  कभी निराशा के बादल बनके कभी हवाओं में खुशबू बनके कभी आसूंओं की जवानी है। मेरे दोस्त बस यही तो जिंदगानी है।। कभी भीड़ में खो जाना कभी अकेले में रो जाना कभी रोते रोते मुस्कुराना  कभी खुशियों की रवानी है। मेरे दोस्त बस यही तो जिंदगानी है।। सुबह उठना, फिर रात को सोना रोज़ गंदा होना, फिर धोना  उखाड़ना जड़ से दरख़तों को और फिर नए पौधों को बोना, इसी कश्मकश में जिन्दगी बीत जानी है। मेरे दोस्त बस यही तो जिंदगानी है। स्वरचित रचना  लेखक  भारत भूषण श्रीवास्तव  ---------------------

तो बोलो जय श्री राम

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राम नाम की धूम मची है भज ले तू भी राम भज ले तू भी राम प्यारे  भज ले तू भी राम   तो बोलो जय श्री राम राम हैं तेरे, राम हैं मेरे  राम ही हैं संसार  तो बोलो जय श्री राम  मन मंदिर में राम बसा ले, राम का कर ले ध्यान तो बोलो जय श्री राम  राम नाम हो, राम ही धाम हो राम करें कल्याण  तो बोलो जय श्री राम  राम मिले तो राम मिलेंगे  राम पे कर विश्वास  तो बोलो जय श्री राम राम नाम की धूम मची है भज ले तू भी राम भज ले तू भी राम प्यारे भज ले तू भी राम  तो बोलो जय श्री राम लेखक (राम कृपा से स्वरचित रचना) भारत भूषण श्रीवास्तव

जय श्री राम

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राम तो केवल नाम नहीं है, ये तो नामों का धाम है। सांस है जो इस जीव जगत का, वो तो जय श्री राम है। एक कदम हम चल ना पाएं  पाँव अगर बेजान हैं। पानी में जो रस्ता बना दे, वो ही नाम तो राम है। सांस है जो इस जीव जगत का वो तो जय श्री राम है। जीवन है भाई एक तपस्या, तप जीवन आधार है। शिव भी जिनका ध्यान लगाएं वो मेरे श्री राम हैं। सांस है जो इस जीव जगत का वो तो जय श्री राम है। दशरथ ढूंढे, केवट पाए, दास बने हनुमान हैं। शबरी के नैनों के आंसू  गाते राम का नाम हैं। सांस है जो इस जीव जगत का वो तो जय श्री राम है। चंचल जीवन, मदमस्त है ये मन, मन को न विश्राम है। मन को भी मुक्ति से जोड़े, मन में गर श्री राम हैं। सांस है जो इस जीव जगत का वो तो जय श्री राम है। ✍️ स्वरचित रचना  भारत भूषण श्रीवास्तव

मैं हिन्दू हूं

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  मैं हिन्दू हूं। मैं ही भारत के जड़ चेतन का बिंदु हूं। मैं हिन्दू हूं। मैंने ही सबको शरण दिया, डूबों की नौका पार किया, मैं पर्वत, मैं गगन, मैं ही वृक्ष और सिंधू हूं, मैं हिन्दू हूं। मैं दयावान जग का कल्याण, मैं विश्वगुरू मैं सबका ध्यान। मैं कृष्ण राम का अंश हूं, मै ही भगवा, मैं ही मां धरती का रक्त हूं। जिसने संसार को धर्म दिया, मै उसी धर्म का अक्षर बिंदू हूं। मैं हिन्दू हूं। मैं क्षमावान, मैं दयावान, मैं ही असुरों से बलवान। मैने ही मुगलों, अंग्रेजो को शरण दिया, मैं प्रतिपालक हूं, मैंने ही सबका पोषण किया। किंतु आज शरणागत के लिए, मैं ही किन्तु परन्तु हूं। मैं हिन्दू हूं। मैं ही भारत के जड़ चेतन का बिंदु हूं। मैं हिन्दू हूं।