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राष्ट्र-प्रेम

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राष्ट्र-प्रेम हे भारत के बाशिंदों। राष्ट्र प्रेम दिखावे में नहीं कर्तव्य में हो।। देश की एकता, अखण्डता सर्वोपरि हो। हम एक ऐसा भारत बनाएं, जो सोने की चिड़िया हो।। भारत का लक्ष्य विकास ही होना चाहिए। विकास कोई भी क्षेत्र मे हो, होना ही चाहिए।। चाहे सामाजिक, आर्थिक, राजनीति सुरक्षा के क्षेत्र हो। भारत जननी जन्म भूमि से हमे प्यार हो।। ऐसा भारत माता के लाल हो । भारत को विश्व गुरू बनाना है।। तिरंगा शान से फहराना है। आओ देश वासियों मिलकर राष्ट्र प्रेम जगाएं।। घर घर जाकर राष्ट्रवाद के बारे मे बतलाएं। जो पथ से भटक गये, उसे राष्ट्रप्रेमी बनाना है।। हम सब मे विकास, एकता अखण्डता की होड़ लगाना है। भारत माता के सिर पर सोने की मुकुट लगाना है।। हर हिन्दुस्तानी के मन मे राष्ट्रप्रेम जगाना है। हर हिन्दुस्तानी के मन मे राष्ट्रप्रेम जगाना है।। जय हिन्द स्वरचित दिलीप कुमार श्रीवास्तव नया रायपुर (छ.ग.)

आजादी गाथा

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।।गीत।।         आजादी गाथा… आजादी की ये गाथा तो,          हमें सब मिल के गाना है!  बड़ी कीमत चुकाई है,           नहीं ये भूल जाना है!                  (१) जिन्होंने दी है कुर्बानी,             उन्हें हम याद करते है!  जजबा जो मिला उनसे,            लिए सीने में फिरते हैं ! दिया है जिम्मेदारी जो,          हमें मिलकर निभाना है!  आजादी की….                    (२) नया ये आज भारत है,      सफल है और सबल भी हैं। दुश्मन में कहां हिम्मत,       अटल भी हैं अचल भी है.. रखेंगे हम इसे अक्षुण,      कसम ये हमको खाना है! आजादी की …. जय हिंद! ✍️ विरेन्द्र शर्मा “अनुज”

हुंकार गणतंत्र की

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***हुंकार गणतंत्र की*** प्रचंड तेज-पुंज जो कराल काल को निगल गया, अखंड राष्ट्र का विहान शत्रु-दंभ को कुचल गया। विराट वज्र-घोष से दिगंत आज गूँजता, स्वतंत्र शौर्य-रक्त से स्वदेश-पथ जो अर्चता। नमन उन्हें, जिनका लहू पावन धरा को सींचता, अदम्य साहसी जो स्वयं ही काल-चक्र को खींचता। प्रखर पुरुषार्थ से वही नियति का मुख मोड़ता, शत्रु-दल के दर्प को जो पल-भर में ही मरोड़ता। वह प्रचंड भुजदंड जो पर्वत-शिखर को तोड़ता, अमर गाथा राष्ट्र की निज रक्त से जो जोड़ता। त्याग का वह शिखर जो झुकने न देता भाल को, चुनौती बन खड़ा जो घेरता प्रतिकाल को। धमनियों में गूँजती जो क्रांति की हुंकार है, वही तो इस वतन के शौर्य का आधार है। विजेता वह, जिसे न भय मरण का त्रास दे, जो धरा के कण-कण में विजय का विश्वास दे। कोटि-कोटि कंठ में जो राष्ट्र-भक्ति जगा रहा, अमरत्व की राह पर जो पग निरंतर बढ़ा रहा। शीश अर्पण कर चुका जो भारती के मान में, अमिट जिसकी कीर्ति है जन-गण-मन के गान में। सत्य का संधान कर जो लक्ष्य को ही भेदता, वह वीर ही तो राष्ट्र का उज्ज्वल भविष्य उकेरता। यही विधान की शक्ति जो जन-मन भाग्य सँवारती, अमर रहे यह तंत्र जो अख...

मैं वज्रपात कर जाऊँगा

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मैं मृत्यु  का  बन के  चारण अब सबको सत्य बताऊँगा रौद्र   रूप   कर   मैं  धारण अब  समर  कराने आऊँगा अश्रुकण  को  मैं भाप  बना अब  घोर घात  करने आया वरदान जहाँ अभिशाप बना मैं   वज्रपात   करने   आया क्यों  मेरी  कविता  मौन रहे? शब्दों  से  युद्ध  करूँगा अब क्यों  रौद्र  भावना  गौण रहे? अश्कों को क्रुद्ध करूँगा अब कर्मठ  यौवन  सीमा  पर  है रक्तिम  सावन  सीमा  पर है कुछ  राम  दिखाई  पड़ते  हैं लाखों  रावण  सीमा  पर हैं वो लहू  बहाते  सरहद  पर कुछ  घर  में  बैठे  हंसते हैं  वीरों  को  मौत  नहीं आती वो   अमरत्व  में   बसते  हैं एक  बेटा  माँ  का मरता है है आँचल  सूना  हो  जाता पछताता भाग्य पर हूँ अपने उस  माँ का  बेटा हो पाता! सीने  पर ...

आजादी- गाथा

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 . ।।आजादी- गाथा।।                         ✍️ विरेन्द्र शर्मा “अनुज” “”””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””"""""                          (1) ऐ मेरे वतन के लोगों,            ना करो कोई नादानी। मुश्किल से मिली आजादी,             फेरो ना उस पर पानी।                             (2) तैतीस कोटि क्षुब्ध हृदय ने,             जब अपने मन में ठानी। तब जाकर मिली आजादी,              न जाने कितनों ने दी कुर्बानी।                              (3) व्यापार का ...

जरूरत क्या थी

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आम से खास बनाने की जरूरत क्या थी? फिर ये अहसास दिलाने की जरूरत क्या थी? जो भी सोचा था वो पूरा न हुआ काम सनम, हाल ए दिल सबको बताने की ज़रूरत क्या थी? हम तो गुमनाम थे गुमनाम यूं ही जी लेते, हमको बदनाम कराने की जरूरत क्या थी? सारी दुनिया से ही मिलने लगी रुसवाई हमें, इस तरह इश्क लड़ाने की जरूरत क्या थी? बेवफ़ा बोल के जब तुझको छोड़ना था मुझे, मुझसे दिल तुझको लगाने की जरूरत क्या थी? न था मालूम कदम ऐसे बहक जाएंगे, इतना नजदीक भी आने की जरूरत क्या थी? तुमको मिलना था तो आ कर के यूं ही मिल लेते, तुम्हे कोई और बहाने की जरूरत क्या थी? मुझको जो खत्म ही करना था जहर दे देते, मेरे ईमां पे निशाने की जरूरत क्या थी? ऐसे नफ़रत से यूं दुत्कार जब भगाना था, मुझको फिर पास बुलाने की जरूरत क्या थी? पहले मुझको निकाला फिर वहीं धकेल दिया, दिल में अरमान जगाने की ज़रूरत क्या थी? कि मेरे पास में आए थे तुम मेरी सुनने, तुमको बस अपनी सुनाने की ज़रूरत क्या थी? प्लास्टर हाथ में और सिर पे भी टांके है लगे, सरे राह प्यार दिखाने की जरूरत क्या थी? उनकी चाहत है कि बस तू यूं ही बर्बाद रहे, उनसे फिर हाथ मिलाने की ज़रूरत क्या थी? त...

सांसें राम की मर्यादा पुरुषोत्तम राम की

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सांसें राम की मर्यादा पुरुषोत्तम राम की कहां सांसें अपनी थी श्री राम की। बस एक समय सारणी थी त्रेता युग में मर्यादा पुरुषोत्तम राम की।   यह एक कहानी बनी थी जब रामायण के नाम की। त्रेता युग में दशरथ के घर जन्मे चारों भैया राम की। बालपन में श्री वाल्मीकि आश्रम में लिया विद्या के संग अनुभव अपार। यही शुरुआत हुई थी मर्यादा संग संस्कार के गहरे विचार।  युवावस्था आई जब मर्यादा पुरुषोत्तम राम की। दिन दिवस वर्ष दशक बढ़ने लगी मर्यादा श्री राम की। श्री राम के नाम के साथ मर्यादा पुरुषोत्तम को जोड़ने के लिए। सांसें कम पड़ गई थी श्री राम को सीता वियोग में जोड़ने के लिए।  वनवास का संयोग सीता का वियोग लव कुश द्वारा मिले कटाक्ष भजन। इन सबको सहने के बाद किया श्री राम ने अपनी सांसों को जल में दमन।

राम गाथा

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राम गाथा बालपन की मर्यादा कैकई मां के लाडले सबसे ज्यादा। आइए सुनिए कलयुग में अनकही अनसुनी राम गाथा। ‌ श्री राम जी को पता था कि वह नारायण के अवतार भगवान थे। और अयोध्यावासी के साथ परिवार के सदस्य भी अनजान थे। कैकई मां के सबसे लाडले श्री राम थे, कुछ पिछले जन्म के अधूरे काम थे। बस इसलिए राम वनवास में कैकई मां बदनाम थी। श्री राम जी के वनवास को पंख से लेकर शंखनाद तक कैकई मां के कारण ही उड़ान मिली। अहिल्या तारण बाली मिलन गरुड़ का सहयोग यहां तक की कैकई मां के कारण ही हनुमान को भक्ति की पहचान मिली। कैकई मां के स्वार्थी स्वभाव के साथ मंथरा कानभरण सबको दिखा। क्या भरत जैसा पुत्र कौशल्या जैसी सास मांडवी जैसी पत्नी और सीता जैसी नारी का त्याग किसी को दिखा। यदि पुत्र मोह में कैकई मां का स्वभाव सामने ना आता। तब कहां कोई सुनता कलयुग में अलग पहलू से राम गाथा।

लिपटा रहूं चरणों में भगवन

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  लिपटा रहूं चरणों में भगवन =============== लिपटा रहूं चरणों में भगवन, जपता रहूं तेरा नाम प्रभु। रोजी रोटी यही हो भगवन, यही हो मेरा काम प्रभु। नींद से जागूं , नींद में जाऊं, जल पीऊं या खाना खाऊं, दौड़ रहा हूं जग के जाल में, करता रहूं तेरा ध्यान प्रभु। लिपटा रहूं चरणों में भगवन, जपता रहूं तेरा नाम प्रभु। श्वास श्वास में राम बसे हों, रोम रोम में श्याम बसे, प्राण पिता परमेश्वर मेरे, मन मंदिर हरि द्वार प्रभु। लिपटा रहूं चरणों में भगवन, जपता रहूं तेरा नाम प्रभु। पथ में अगर चलूं मैं भगवन, राम श्याम विश्राम प्रभु, मंजिल एक हो, लक्ष्य हो मेरा, नाम करूं गुणगान प्रभु। लिपटा रहूं चरणों में भगवन, जपता रहूं तेरा नाम प्रभु। रचनाकार भारत भूषण श्रीवास्तव

राम ही जानते हैं

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राम ही जानते हैं राम जी के जीवन का दुःख, राम ही जानते हैं, राम ही जानते हैं। वचन निभाने छोड़ा घर, माता कैकेयी के कहने पर। भरत को दिया राज-सिंहासन, स्वयं चले वन में रहने पर। मानव जीवन के दुःख-सुख को, वह भली-भाँति पहचानते हैं, राम जी के जीवन का दुःख, राम ही जानते हैं, राम ही जानते हैं। भ्राता भरत को देख प्रसन्न होकर, गले लगाया राम जी ने। पिता के स्वर्ग सिधारने का समाचार सुन राजा होकर भी राम जी रोए थे। स्वर्ण-मृग के पीछे जब वे दौड़े, रावण सिया को हर ले गया था। सिया ने अपने आभूषण त्याग मार्ग का संकेत दिया था। सिया की खोज की उन रातों में, कैसे राजा सोए होंगे? एक-एक दिन सिया की विरह में, अवध के राजा भी रोए होंगे। मानव जीवन की हर पीड़ा को, वह भली-भाँति पहचानते हैं। राम जी के जीवन का दुःख, राम ही जानते हैं, राम ही जानते हैं। करन बघेल.. रायपुर

जय श्री राम

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कई ज़माने बाद लिखने बैठी आज, मिला था विषय श्री राम जी पर लिखने को, फिर सोचते ही बैठ गई आखिर, लिखूं ही क्या जय श्री राम के अलावा? जिस जय श्री राम को लिखते ही, पत्थर भी तैरने लगे थे समंदर पर, और बन गया था राम सेतु। उसकी व्याख्या भला मैं कैसे करूं? जिस जय श्री राम के उच्चारण मात्र से, लांघ गए कई कोस समंदर,  को भक्त हनुमान। उसकी व्याख्या भला मैं कैसे करूं? जिस जय श्री राम के स्मरण मात्र से, नन्हीं गिलहरियों ने बना, दिया था रेत से रास्ता। उसकी व्याख्या भला मैं कैसे करूं? जिस जय श्री राम के बल से, चीर दिखाया था सीना अपना, भरी सभा में भक्त हनुमान ने। उसकी व्याख्या भला मैं कैसे करूं? जिस जय श्री राम की व्याख्या मे, ना बचेंगे दिन और रात, और न पूरेगा जीवन मेरा। उसकी व्याख्या भला मैं कैसे करूं? बस कहना चाहूं यही बात, दिल से बोलो बस एक बार, जय श्री राम बनेंगे, सबके बिगड़े काम ।

बाल राम मुस्काते हैं

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देखो बाल राम मुस्काते हैं, हृदय में सबके करुणा बरसाते हैं। धरती फूलों सी मुस्काती, हर एक खेत खुशियों से लहलहाते हैं । देखो बाल राम मुस्काते हैं, ये जन्म नहीं एक बालक का। ये तो एक नए युग का जन्म है, जन्म यही है भगवा पताके के स्थापक का । देखो बाल राम मुस्काते हैं, गोदी में खेल रहे माता के। जो नाभी से जन्माते ब्रह्मा को, चक्र सुदर्शन घुमाने वाले पिरो रहे प्रेम नातों के। देखो बाल राम मुस्काते हैं, टेढ़ी–मेढ़ी चाल चले रुनझुन रुनझुन पायल संग। जो करदे सीधा दुष्टों को अपनी एक चाल से, वो दिखा रहे संसार को अपने बालपन का रंग।

श्री राम कथा

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*******" श्री राम कथा ******* चैत्र मास की नवमी आई, लेकर अद्भुत उजियारा, राजा दशरथ के घर जन्मे, श्री राम लला प्यारा । गाए देव गण और ऋषि मुनि, बधाई के मंगल गीत, जन मानस सब झूम रहे थे, सुन खुशियों भरा संगीत। शिक्षा प्राप्ति हेतु गुरु विश्वामित्र के पास गए, सब सीख कला कौशल, शिष्य वह खास बने। किया ताड़का सुबाहु वध, ऋषियों का संताप हरा, किया अंत इन असुरों का, धरती से पाप छटा । आए राम-लक्ष्मण गुरु विश्वामित्र के संग, जनकपुर की नगरी में थी चारों ओर उमंग। सीता स्वयंवर की बात सुनी, शर्त थी बहुत ही भारी, शिव धनुष जो उठाएगा, होगी उनकी सीता प्यारी। भूपत आए देश-देश से, दिखाने बल पौरुष भारी, पर धनुष धरा पर धरा रहा , जनक हुए चिंताकुल भारी। बोले विदेह व्याकुल होकर, क्या वीर-विहीन हुई धरती सारी? नतमस्तक बैठे हो सब, क्या वैदेही रहेगी आजन्म कुँवारी? बातें इनकी सुन लक्ष्मण गरजे, सुनिए हे मिथिलेश ! बालपन में ऐसे अनेकों धनुष तोड़े हमने, यह धनुष नहीं कुछ विशेष। ऐसी वाणी ना बोलिए, बैठे हो श्री राम जहाँ, धनुष तोड़ना तो कुछ नहीं, ब्रह्माण्ड उठा सकता हूँ यहाँ। श्रीराम ने क्रोध उनका शांत कर, गुरु विश्वामित्र...

माता जानकी

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माता जानकी  (सीता हरण का दृश्य) जब बात हो रघुकुल के मान- सम्मान की  लगने कैसे देती कलंक कुलवधू माता जानकी  कोई बंधन नहीं, कोई सीमा नहीं,  वह तो थी महज सुरक्षा रेखा समझकर तपस्वी रावण को माता ने कदम रेखा पार रखा  आरंभ अपने अंत का उसी क्षण कर लिया  जिस क्षण रावण ने सीता हर लिया सकल समाज यह कुप्रश्न उठाए लक्ष्मण रेखा भी जिसे सुरक्षित न रख पाए लंका में रही वही सीता भला  कैसे पवित्र कहलाए? दावे से मैं एक बात कहती हूं  सुन लो सत्य मैं आज कहती हूं  व्यर्थ है अपनों का लगाया  सीमा और सुरक्षा रेखा नारी नहीं सुरक्षित तब तक  जब तक वह स्वयं न रख ले अपने सम्मुख  सबल -सक्षम -सशक्त एक तिनका  लांछन नारी पर सदा से ही  लगते हैं, लगाते हैं  निर्दोष को ही लोग दोषी बताते हैं  अग्निपरीक्षा से पीछे क्यों हटती माता  जो हटती पीछे तो उनके प्रेम पर भी लांछन लग जाता  आराध्य पर लगा लांछन कोई भक्त कैसे सहेगा  हो चाहे परीक्षा अग्नि की वह हंसते-हंसते देगा हर युग में अवतरित होती जनक सुता  प्रेम से जनकपुर, सींचती संस्कारों ...

सरहदों के राम

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सरहदों के राम त्याग दी पिता की विरासत  माता के आंचल से हुए दूर  उन्होंने त्याग दिए निज महल  प्रिय के आस भी हो गए चकनाचूर  नहीं यह माता कैकई का आदेश नहीं  यह त्याग मां भारती के नाम है  खड़े हैं जो सरहदों पर वह भी तो राम हैं । वे रखते सदा माता का मान न्योछावर करते निज प्राण  सीता स्वयंवर के धनु बाण हैं  अहिल्या के तपोफल का परिणाम हैं  जन-जन के नायक जन-जन का गान हैं  जिस कुटिया में जन्मे पावन वह धाम है  खड़े हैं जो सरहदों पर वह भी तो राम हैं मातृभूमि की रक्षा में  जल-थल-नभ नाप लिया  “अहिंसा परमो धर्म:  धर्म हिंसा तदैव च”  जाप लिया,  वो सौम्यवान, शौर्यवान  होकर दिनकर, सरल दीप सा ताप दिया  रघुकुल के संस्कारों  के ही परिणाम हैं  खड़े हैं जो सरहदों पर  वे भी तो राम हैं।। © यामिनी सूर्यजा

राम वनवास नहीं जाते तो

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।। राम वनवास नहीं जाते तो ।।              ✍️ विरेन्द्र शर्मा "अनुज" """"""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""" यदि माता कैकेयी, ना होती, तो राम वनवास, नहीं जाते। ना ही सीता, हरण हुआ होता, ना रावण ही, मारा जाता। ऐसी बहुत सी भ्रांतियां, बहुधा, मानव मन में, लगा उठने। समझ में जिसकी, जो आया, अपनी अपनी सोच, रखा उसने। कृष्ण ने कहा, सुनो अर्जुन, जो कहते युद्ध नहीं, करोगे तुम। तब भी सब, मारे जायेंगे, किसी भ्रम में नहीं, पड़ो ना तुम। भगवदगीता का, हरेक शब्द, ब्रह्म से निकला, ज्ञान है। होनी तो पहले से, तय होता, कर्म प्रेरणा से, होता संज्ञान है। यदि राम, वनवास नहीं जाते, तो राजा राम, मृगया को जाते। तब ...

राम जन्म भूमि

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।।राम जन्म भूमि।।                   ✍️ विरेन्द्र शर्मा “अनुज” “”””””””””””””””””“””””””””””””””””””””””””” भारत भूमि अवधपुर गावहिं,              आज अयोध्या धाम कहावहिं!  विराज रहे हैं प्रभु निज धामा,               कौशिल्या सुत रघुकुल रामा!!  ढोल मृदंग मंजीरा साजे,                 शंख नगाड़ा दुंदुभि बाजे!  सजा अयोध्या दुल्हन जैसे,           पुलकित लोग बरनन करूँ कैसे!!  जिनके नाम काल डर जाहिं,        सोई दशरथ के राम कहावहिं!  बाल रूप तुम्ह करहु निवासा,           बेगि हरो प्रभु तम सब दासा!!  बरस पांच सौ कैसे बीता,               बिन तुम्हरे सरजू था रीता!  आज प्रभु तुम अति सुख दीन्हा,               भगतन की पीड़ा हर ...

रामनाम-नामावलि

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।। रामनाम-नामावलि।।                               ✍️ विरेन्द्र शर्मा “अनुज” “”””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””” राम नाम से आंखें खुलती, आंखें बंद करें तो राम। राम बिना पत्ते ना हिलते,गिनती का आरंभ ही राम।। दादा राम पोता राम दादा के परदादा राम। काका राम बेटा राम, मामा राम भांचा राम।। दयाराम पुनिराम , ढालुराम गयाराम। आजूराम साजूराम, कालूराम मयाराम।। गन्नूराम धन्नुराम, झाड़ूराम जीतूराम। हीराराम मोतीराम, पूनाराम गीतूराम।। दुजराम तीजराम, चैतराम बैसाखूराम। झड़ीराम जेठूराम,कार्तिकराम फागूराम।। मंशाराम टीकाराम,खेलनराम मेलनराम। सीताराम गीताराम,भूलनराम झूलनराम।। रामपुकार रामबिशाल,रामदयाल रामकृपाल। रामप्रसाद रामनिवास,रामसनेही रामनिहाल।। रामकृष्ण रामकुमार, रामभरोसे रामअवतार। रामचरण रामशरण, रामनिशाद रामअधार।। रामानुज रामाचार्य, रामेश्वर रामपाल। रामाश्रय रामनिहोरे,रामाधीन रामलाल।। शिवराम विष्णुराम, हरेराम हरिराम। धनदराम सनदराम,कलिराम बलीराम।। धनउराम बनऊराम, सन...

अर्जी सुन लो राम

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मेरी अर्जी सुन लो राम, मेरा जीवन सफल कर दो। संग-संग चल लो राम, मेरी राह सरल कर दो। पापी हूँ मैं, अधमी हूँ, प्रभु, तेरा ही सहारा है। ना आस रहा जग का, सब कुछ ही दिखावा है। मेरी नाव डूबी मझधार, प्रभु, आके बचा लेना। हे कृपा सिंधु दाता, जग के पालन कर्ता। कभी धैर्य ना खोयें हम, बस पकड़ें धर्म रस्ता। आहत हूँ जग से, तेरा ही सहारा है। शिव धनुष भंग करके, प्रभु सीता संग ब्याह रचा। नहीं कोई था जग में, जो धनुष उठा सका। न तुमसा कोई वीर, ना कोई ज्ञानी होगा। शबरी के बेर का मीठापन, तुमसे है भगवन। केवट का ज़िद्दीपन, तुमसे है भगवन। मेरी नैया पार लगाओ प्रभु, बड़ी दूर किनारा है। रख मान वचन का तुम, वन-वन भटके हो राम। सहनशील और त्याग में, अग्रणी हो राम। मर्यादित रहकर तुम, मर्यादा सिखाते हो। कर बाली का अंत, मित्रता का मिसाल दिया। मृत शीला को जिला करके, अहिल्या का उद्धार किया। मेरे अधर में अटके प्राण, प्रभु, आके बचा लेना। पंछी का कलरव तुमसे, बगिया में महक तुमसे। है चांद में शीतलता, सूरज में तपन तुमसे। जिस ओर नज़र जाता,तेरा ही नज़ारा है। अब तेरे सिवा रघुवर , कोई ना हमारा है।

उदासी

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आज फिर वही अधबने पुल को  उदासी की हालत में छोड़कर  मैं घर की और निकला शाम भी तो उदास ही थी और रुका  मैं जाकर सड़क के उस उदास हिस्से में जहां मैंने कभी विदा की थी अपनी तमाम खुशियां थोड़ा आगे बढ़ा  और  वहीं सड़क के किनारे वो पीपल का पेड़  उदासी समेटे खड़ा हुआ दिखाई दिया ये वही तो नही हां पर उस जैसा जरूर है जिसके तले हमने अपना सारा बचपन  सपने बुनते हुए गुज़ार दिया मैने फोन निकाला उसमें मेरी तस्वीर नहीं थी बस थे तो कुछ उदास चेहरे तमाम गैलरी की तस्वीरें खंगाली  पर कहीं मुझे उदासी से परे  कुछ न मिला और अगर मिल भी जाता तो क्या उसमें मुझे,  मैं मिलता  शायद नहीं यही सवाल  और  मेरी मरी हुई सारी खुशियां लेकर  उदासी को वापिस जेब में रखकर  मैं घर आ गया ।।