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राष्ट्र-प्रेम

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राष्ट्र-प्रेम हे भारत के बाशिंदों। राष्ट्र प्रेम दिखावे में नहीं कर्तव्य में हो।। देश की एकता, अखण्डता सर्वोपरि हो। हम एक ऐसा भारत बनाएं, जो सोने की चिड़िया हो।। भारत का लक्ष्य विकास ही होना चाहिए। विकास कोई भी क्षेत्र मे हो, होना ही चाहिए।। चाहे सामाजिक, आर्थिक, राजनीति सुरक्षा के क्षेत्र हो। भारत जननी जन्म भूमि से हमे प्यार हो।। ऐसा भारत माता के लाल हो । भारत को विश्व गुरू बनाना है।। तिरंगा शान से फहराना है। आओ देश वासियों मिलकर राष्ट्र प्रेम जगाएं।। घर घर जाकर राष्ट्रवाद के बारे मे बतलाएं। जो पथ से भटक गये, उसे राष्ट्रप्रेमी बनाना है।। हम सब मे विकास, एकता अखण्डता की होड़ लगाना है। भारत माता के सिर पर सोने की मुकुट लगाना है।। हर हिन्दुस्तानी के मन मे राष्ट्रप्रेम जगाना है। हर हिन्दुस्तानी के मन मे राष्ट्रप्रेम जगाना है।। जय हिन्द स्वरचित दिलीप कुमार श्रीवास्तव नया रायपुर (छ.ग.)

आजादी गाथा

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।।गीत।।         आजादी गाथा… आजादी की ये गाथा तो,          हमें सब मिल के गाना है!  बड़ी कीमत चुकाई है,           नहीं ये भूल जाना है!                  (१) जिन्होंने दी है कुर्बानी,             उन्हें हम याद करते है!  जजबा जो मिला उनसे,            लिए सीने में फिरते हैं ! दिया है जिम्मेदारी जो,          हमें मिलकर निभाना है!  आजादी की….                    (२) नया ये आज भारत है,      सफल है और सबल भी हैं। दुश्मन में कहां हिम्मत,       अटल भी हैं अचल भी है.. रखेंगे हम इसे अक्षुण,      कसम ये हमको खाना है! आजादी की …. जय हिंद! ✍️ विरेन्द्र शर्मा “अनुज”

हुंकार गणतंत्र की

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***हुंकार गणतंत्र की*** प्रचंड तेज-पुंज जो कराल काल को निगल गया, अखंड राष्ट्र का विहान शत्रु-दंभ को कुचल गया। विराट वज्र-घोष से दिगंत आज गूँजता, स्वतंत्र शौर्य-रक्त से स्वदेश-पथ जो अर्चता। नमन उन्हें, जिनका लहू पावन धरा को सींचता, अदम्य साहसी जो स्वयं ही काल-चक्र को खींचता। प्रखर पुरुषार्थ से वही नियति का मुख मोड़ता, शत्रु-दल के दर्प को जो पल-भर में ही मरोड़ता। वह प्रचंड भुजदंड जो पर्वत-शिखर को तोड़ता, अमर गाथा राष्ट्र की निज रक्त से जो जोड़ता। त्याग का वह शिखर जो झुकने न देता भाल को, चुनौती बन खड़ा जो घेरता प्रतिकाल को। धमनियों में गूँजती जो क्रांति की हुंकार है, वही तो इस वतन के शौर्य का आधार है। विजेता वह, जिसे न भय मरण का त्रास दे, जो धरा के कण-कण में विजय का विश्वास दे। कोटि-कोटि कंठ में जो राष्ट्र-भक्ति जगा रहा, अमरत्व की राह पर जो पग निरंतर बढ़ा रहा। शीश अर्पण कर चुका जो भारती के मान में, अमिट जिसकी कीर्ति है जन-गण-मन के गान में। सत्य का संधान कर जो लक्ष्य को ही भेदता, वह वीर ही तो राष्ट्र का उज्ज्वल भविष्य उकेरता। यही विधान की शक्ति जो जन-मन भाग्य सँवारती, अमर रहे यह तंत्र जो अख...

मैं वज्रपात कर जाऊँगा

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मैं मृत्यु  का  बन के  चारण अब सबको सत्य बताऊँगा रौद्र   रूप   कर   मैं  धारण अब  समर  कराने आऊँगा अश्रुकण  को  मैं भाप  बना अब  घोर घात  करने आया वरदान जहाँ अभिशाप बना मैं   वज्रपात   करने   आया क्यों  मेरी  कविता  मौन रहे? शब्दों  से  युद्ध  करूँगा अब क्यों  रौद्र  भावना  गौण रहे? अश्कों को क्रुद्ध करूँगा अब कर्मठ  यौवन  सीमा  पर  है रक्तिम  सावन  सीमा  पर है कुछ  राम  दिखाई  पड़ते  हैं लाखों  रावण  सीमा  पर हैं वो लहू  बहाते  सरहद  पर कुछ  घर  में  बैठे  हंसते हैं  वीरों  को  मौत  नहीं आती वो   अमरत्व  में   बसते  हैं एक  बेटा  माँ  का मरता है है आँचल  सूना  हो  जाता पछताता भाग्य पर हूँ अपने उस  माँ का  बेटा हो पाता! सीने  पर ...

आजादी- गाथा

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 . ।।आजादी- गाथा।।                         ✍️ विरेन्द्र शर्मा “अनुज” “”””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””"""""                          (1) ऐ मेरे वतन के लोगों,            ना करो कोई नादानी। मुश्किल से मिली आजादी,             फेरो ना उस पर पानी।                             (2) तैतीस कोटि क्षुब्ध हृदय ने,             जब अपने मन में ठानी। तब जाकर मिली आजादी,              न जाने कितनों ने दी कुर्बानी।                              (3) व्यापार का ...

जरूरत क्या थी

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आम से खास बनाने की जरूरत क्या थी? फिर ये अहसास दिलाने की जरूरत क्या थी? जो भी सोचा था वो पूरा न हुआ काम सनम, हाल ए दिल सबको बताने की ज़रूरत क्या थी? हम तो गुमनाम थे गुमनाम यूं ही जी लेते, हमको बदनाम कराने की जरूरत क्या थी? सारी दुनिया से ही मिलने लगी रुसवाई हमें, इस तरह इश्क लड़ाने की जरूरत क्या थी? बेवफ़ा बोल के जब तुझको छोड़ना था मुझे, मुझसे दिल तुझको लगाने की जरूरत क्या थी? न था मालूम कदम ऐसे बहक जाएंगे, इतना नजदीक भी आने की जरूरत क्या थी? तुमको मिलना था तो आ कर के यूं ही मिल लेते, तुम्हे कोई और बहाने की जरूरत क्या थी? मुझको जो खत्म ही करना था जहर दे देते, मेरे ईमां पे निशाने की जरूरत क्या थी? ऐसे नफ़रत से यूं दुत्कार जब भगाना था, मुझको फिर पास बुलाने की जरूरत क्या थी? पहले मुझको निकाला फिर वहीं धकेल दिया, दिल में अरमान जगाने की ज़रूरत क्या थी? कि मेरे पास में आए थे तुम मेरी सुनने, तुमको बस अपनी सुनाने की ज़रूरत क्या थी? प्लास्टर हाथ में और सिर पे भी टांके है लगे, सरे राह प्यार दिखाने की जरूरत क्या थी? उनकी चाहत है कि बस तू यूं ही बर्बाद रहे, उनसे फिर हाथ मिलाने की ज़रूरत क्या थी? त...

सांसें राम की मर्यादा पुरुषोत्तम राम की

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सांसें राम की मर्यादा पुरुषोत्तम राम की कहां सांसें अपनी थी श्री राम की। बस एक समय सारणी थी त्रेता युग में मर्यादा पुरुषोत्तम राम की।   यह एक कहानी बनी थी जब रामायण के नाम की। त्रेता युग में दशरथ के घर जन्मे चारों भैया राम की। बालपन में श्री वाल्मीकि आश्रम में लिया विद्या के संग अनुभव अपार। यही शुरुआत हुई थी मर्यादा संग संस्कार के गहरे विचार।  युवावस्था आई जब मर्यादा पुरुषोत्तम राम की। दिन दिवस वर्ष दशक बढ़ने लगी मर्यादा श्री राम की। श्री राम के नाम के साथ मर्यादा पुरुषोत्तम को जोड़ने के लिए। सांसें कम पड़ गई थी श्री राम को सीता वियोग में जोड़ने के लिए।  वनवास का संयोग सीता का वियोग लव कुश द्वारा मिले कटाक्ष भजन। इन सबको सहने के बाद किया श्री राम ने अपनी सांसों को जल में दमन।