क्या सहज है
क्या सहज है धरती पर मानव का अवतार लेना। क्या सहज है त्रेता में मर्यादा का भार लेना। अयोध्या की धरा पर खेला, तीन मांओं का लाड़ पाया, दशरथ की आंखों का तारा, रघुकुल का दीपक उजियारा, राजतिलक के शुभ अवसर पर, भवन छोड़ वन स्वीकार करना। क्या सहज है धरती पर... जनक राज की दुलारी सीता, मधुर बोल, कंचन-सी काया, चारों पहर दास-दासी जिन्हें घेरे, कष्ट जिन्हें कोई छू न पाए, प्राणप्रिये उस जानकी से, सीता हरण का बिछोह सहना। क्या सहज है धरती पर... लखन-सा भ्राता न दूजा, हर कष्ट मेरा, बांट वो लेता मां की ममता, पत्नी का प्यार सब तज दिया, बस सेवा आधार शाक्ति-बाण जब लगा लक्ष्मण को, काल से प्राण की गुहार करना। क्या सहज है धरती पर.. क्या सहज है त्रेता में मर्यादा का भार लेना। स्वरचित कविता तुलसी साहू मगरलोड धमतरी (छ.ग.)