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क्या सहज है

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क्या सहज है धरती पर मानव का अवतार लेना। क्या सहज है त्रेता में मर्यादा का भार लेना। अयोध्या की धरा पर खेला, तीन मांओं का लाड़ पाया, दशरथ की आंखों का तारा,  रघुकुल का दीपक उजियारा, राजतिलक के शुभ अवसर पर,  भवन छोड़ वन स्वीकार करना। क्या सहज है धरती पर... जनक राज की दुलारी सीता, मधुर बोल, कंचन-सी काया, चारों पहर दास-दासी जिन्हें घेरे, कष्ट जिन्हें कोई छू न पाए, प्राणप्रिये उस जानकी से, सीता हरण का बिछोह सहना। क्या सहज है धरती पर...   लखन-सा भ्राता न दूजा, हर कष्ट मेरा, बांट वो लेता मां की ममता, पत्नी का प्यार  सब तज दिया, बस सेवा आधार  शाक्ति-बाण जब लगा लक्ष्मण को, काल से प्राण की गुहार करना।  क्या सहज है धरती पर.. क्या सहज है त्रेता में मर्यादा का भार लेना। स्वरचित कविता  तुलसी साहू  मगरलोड धमतरी (छ.ग.)

सम्हाल लेना राम

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शीर्षक - सम्हाल लेना राम जब हारने लगूं, तो तुम सम्हाल लेना राम। जब गिरने लगूं, तो तुम थाम लेना करुणा-निधान। जैसे शबरी को संवारा, जैसे अहिल्या को तारा। वैसे मेरी नैय्या के खेवैया, तुम बन जाना पालनहार। जब हारने लगूं ... दुनिया गोल-गोल सी लगती है। सही-गलत सब समझ से परे लगता है। परिस्थितियां, तन्हाइयां भटका देती हैं। जैसे वनवास पाकर भी तुम शांत रहे। जैसे समुद्र देव का अहम देखकर भी तुम विनम्र रहे। वैसे मुझे शीतलता, धीरता दे देना, नाथ। जब हारने लगूं ... तुमसे बड़ा ना कोई सहारा। तुमसे बना यह धरती-गगन सारा। जो तुम चाहो, भक्त को मित्र बना दो। जो तुम चाहे, राजा को रंक बना दो। जैसे जगतपिता होकर दशरथ के पुत्र बने। जैसे सुखदाता होकर जग का सारा कष्ट सहे। वैसे मुझमें दया, साहस भर देना, रघुनंदन। जब हारने लगूं, तो तुम सम्हाल लेना राम। स्वरचित कविता  तुलसी साहू  मगरलोड, धमतरी (छ.ग.)

मेरे आसमां का चांद

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शीर्षक - मेरे आसमां का चांद मेरी कमियां मुझे ही पूरा करने दे,  मेरे आसमां का चांद मुझे ही बनने दे।  जिंदगी अगर युद्धभूमि है,  तो मेरी लड़ाई मुझे ही लड़ने दे। मेरे आसमां का चांद ...... थोड़ा गिरने दे, थोड़ा रोने दे,  अगर हालात और जज्बात इम्तिहान लेते हैं, तो बेशक मुझे इन मुश्किलों से गुजरने दे। मेरे आसमां का चांद .... सुना है हार, आलोचनाएं और लोग हौसला तोड़ देते हैं, सहते-सहते सब्र भी साथ छोड़ देते हैं, टूट-टूट कर मुझे खुद को जोड़ने दे। मेरे आसमां का चांद....  अक्सर सपनों और जिम्मेदारियों के बीच जंग चलती हैं,  सपनें अपनी ओर खींचते हैं, और ये जिम्मेदारियां सपनों से दूर करती हैं, मुझे सपनों और जिम्मेदारियों का साथ निभाने दे।  मेरे आसमां का चांद..... इतनी उम्मीद तो है जिंदगी से, हर रात सवेरा लाती है, हर ठोकर मंजिल तक पहुंचने का पैगाम देती है, मेरे संघर्ष से मुझे मेरा इतिहास रचने दे। मेरे आसमां का चांद मुझे ही बनने दे। स्वरचित कविता  तुलसी साहू  मगरलोड, धमतरी छग

मर्द

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शीर्षक - मर्द  क्यों कहते हैं कि मर्द को दर्द नहीं होता? कौन कहता है की लड़के रोते नहीं? भावनाएं, संवेदनाएं तो उनमें भी होती हैं, घर की याद, अपनों की उम्मीदें, उनको भी तो सताती हैं। और इतना सख्त मजबूत कैसे बना दिया हमने, उनके जज्बातों को लड़का समझ नजर अंदाज करके। तुम बस अपना सपना पूरा करो,  पैसे की परवाह मत करो, ये कहने वाला,  उनके नसीब में कहां होता है। दिल उनका भी तो टूटता है, कोशिशें उनकी भी तो हारती हैं,  परेशानियां उनको भी तो बेचैन करती हैं, और अपनों का साथ, घर की याद,  उनको भी तो सताती है। फिर कैसे दर्द ना हो मर्द को, और कैसे छलके न आंखें लड़कों की। उन्हें शिकायतों से परे समझने वाला चाहिए,  सही-गलत, जीत-हार से परे अपनाने वाला चाहिए,  उन्हें गले लगकर रो लेने दो, दिल की बात खुलकर कह लेने दो। क्योंकि मर्द को दर्द होता है, और लड़के भी रोते हैं। ✍️ स्वरचित कविता  तुलसी साहू  मगरलोड, धमतरी छग