मैं वज्रपात कर जाऊँगा


मैं मृत्यु  का  बन के  चारण

अब सबको सत्य बताऊँगा

रौद्र   रूप   कर   मैं  धारण

अब  समर  कराने आऊँगा


अश्रुकण  को  मैं भाप  बना

अब  घोर घात  करने आया

वरदान जहाँ अभिशाप बना

मैं   वज्रपात   करने   आया


क्यों  मेरी  कविता  मौन रहे?

शब्दों  से  युद्ध  करूँगा अब

क्यों  रौद्र  भावना  गौण रहे?

अश्कों को क्रुद्ध करूँगा अब


कर्मठ  यौवन  सीमा  पर  है

रक्तिम  सावन  सीमा  पर है

कुछ  राम  दिखाई  पड़ते  हैं

लाखों  रावण  सीमा  पर हैं


वो लहू  बहाते  सरहद  पर

कुछ  घर  में  बैठे  हंसते हैं 

वीरों  को  मौत  नहीं आती

वो   अमरत्व  में   बसते  हैं


एक  बेटा  माँ  का मरता है

है आँचल  सूना  हो  जाता

पछताता भाग्य पर हूँ अपने

उस  माँ का  बेटा हो पाता!


सीने  पर  जिसके था भारी

शत स्वप्नों का अम्बार लगा

थी अरमानों की भीड़ लगी

वो करने सब  साकार चला


कर्तव्यों  पर  उनके  लेकिन 

आवाज़   उठाते   हैं  कायर

बन जाओ वीरता के चारण

क्यों बनते  प्रेम भरे  शायर?


जो अपना रक्त बहा कर के

मैय्या  की  लाज  बचाते हों

हिमखण्ड भेद कर बढ़ते हों

हँसकर  गोली  खा जाते हों


संसद  की  चौखट  पर  मैंने

लांछन  उन  पर लगते देखा

कुर्सी   की  ख़ातिर  नेता  ने

है   देशप्रेम   बिकते    देखा


मैं   प्रश्न   पूछता   हूँ   सबसे

क्या ख़ून नहीं खौलेगा अब?

मैं चुप होकर क्या जी लूँगा?

क्या कवि नहीं बोलेगा अब?


साँसों को रोकना कठिन नहीं

शब्दों    को    कैसे    रोकोगे?

तुम कुकुर बनो , मैं एकलव्य

भर शर मुह में  क्या भौंकोगे?


चेताता   हूँ   मैं  ,  चुप  रहना

वीरों को  अपशब्द  न कहना

वरना स्याही का  छोड़ प्रयोग

मैं  अस्त्र  उठा  कर  आऊँगा,

मैं  वज्रपात  कर  जाऊँगा ‍।


---- ऋत्विक

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