हुंकार गणतंत्र की


***हुंकार गणतंत्र की***


प्रचंड तेज-पुंज जो कराल काल को निगल गया,

अखंड राष्ट्र का विहान शत्रु-दंभ को कुचल गया।

विराट वज्र-घोष से दिगंत आज गूँजता,

स्वतंत्र शौर्य-रक्त से स्वदेश-पथ जो अर्चता।


नमन उन्हें, जिनका लहू पावन धरा को सींचता,

अदम्य साहसी जो स्वयं ही काल-चक्र को खींचता।

प्रखर पुरुषार्थ से वही नियति का मुख मोड़ता,

शत्रु-दल के दर्प को जो पल-भर में ही मरोड़ता।


वह प्रचंड भुजदंड जो पर्वत-शिखर को तोड़ता,

अमर गाथा राष्ट्र की निज रक्त से जो जोड़ता।

त्याग का वह शिखर जो झुकने न देता भाल को,

चुनौती बन खड़ा जो घेरता प्रतिकाल को।


धमनियों में गूँजती जो क्रांति की हुंकार है,

वही तो इस वतन के शौर्य का आधार है।

विजेता वह, जिसे न भय मरण का त्रास दे,

जो धरा के कण-कण में विजय का विश्वास दे।


कोटि-कोटि कंठ में जो राष्ट्र-भक्ति जगा रहा,

अमरत्व की राह पर जो पग निरंतर बढ़ा रहा।

शीश अर्पण कर चुका जो भारती के मान में,

अमिट जिसकी कीर्ति है जन-गण-मन के गान में।


सत्य का संधान कर जो लक्ष्य को ही भेदता,

वह वीर ही तो राष्ट्र का उज्ज्वल भविष्य उकेरता।

यही विधान की शक्ति जो जन-मन भाग्य सँवारती,

अमर रहे यह तंत्र जो अखंड ओज विस्तारती।


उठो कोटि-कोटि अब प्रखर भुजदंड तानना,

प्रचंड राष्ट्र-शक्ति का विजय-उद्घोष ठानना।

अजय तिरंगा हाथ ले जो कीर्ति-गाथा गाएगा,

वही अखंड शौर्य जग में शीर्ष स्थान पाएगा।


🖋️ कन्हैया कुमार

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