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हो मनुज राम सा

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************************ शीर्षक: हो मनुज राम सा ************************ हो सरल राम सा, मेरे श्री राम सा। राम की हो कृपा, हो मनुज राम सा। माँ-पिता के लिए वन गमन कर लिया। जब गुरु ने कहा सिय वरण कर लिया। पुत्र हो राम सा, शिष्य हो राम सा। वर हो श्री राम सा, हो मनुज राम सा। संग लखन को, भरत को सिंहासन दिए। मित्र सुग्रीव का दुख निवारण किए। भाई हो राम सा, मित्र हो राम सा। राम की हो कृपा, हो मनुज राम सा। भक्त बजरंग बली उनके सेवक प्रथम। उनकी शिव भक्ती का साक्षी रामेश्वरम। हो प्रभु राम सा, भक्त हो राम सा। राम की हो कृपा, हो मनुज राम सा। ************************ स्वरचित मौलिक रचना अर्चना श्रीवास्तव कवयित्री रायपुर, छत्तीसगढ़ ************************

जय श्री राम, जय श्री राम

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************************ शीर्षक: जय श्री राम, जय श्री राम ************************ एक ही नारा, एक ही नाम, जय श्री राम, जय श्री राम। पुण्य प्रतापी एक ही धाम, जय श्री राम, जय श्री राम। वट की छाया जब हो घाम, जय श्री राम, जय श्री राम। सबके दाता राजा राम, जय श्री राम, जय श्री राम। अवधपुरी के राजपुत्र हैं, चलते ठुमक ठुमक कर। सब जन उनका दर्शन चाहें, चाहे दुबक दुबक कर। सबके राजदुलारे राम, जय श्री राम, जय श्री राम। सबके दाता राजा राम, जय श्री राम, जय श्री राम। माता पिता की आज्ञा पाकर, बन बैठे वनवासी। उनके ना होने पर पूरे अवध में आज उदासी। दशरथ रोज पुकारें राम, जय श्री राम, जय श्री राम। सबके दाता राजा राम, जय श्री राम, जय श्री राम। धर्म पताका लहराने को पृथ्वी लोक में आए। असुर जनों के अत्याचार से साधू संत बचाए। विष्णु के अवतारी राम, जय श्री राम, जय श्री राम। सबके दाता राजा राम, जय श्री राम, जय श्री राम। ************************ स्वरचित मौलिक रचना अर्चना श्रीवास्तव कवयित्री रायपुर, छत्तीसगढ़ ************************

आज मन शांत है

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************************ शीर्षक: आज मन शांत है ************************ अहम की दीवार गिर चुकी है, विचार शुद्ध हैं। लोगों की आलोचना से भी, मन नहीं क्रुद्ध है। आज मन शांत है। लोग क्या कह रहे हैं, कोई फर्क नहीं। कहीं कोई उलझन, तर्क, कुतर्क नहीं। आज मन शांत है। दैनिक गृहकार्य रुचिकर हैं, नहीं कोई खिन्नता। हृदय में है तो केवल, प्रसन्नता ही प्रसन्नता। आज मन शांत है। संतोष भी, खुशी भी, स्वयं पर नियंत्रण है। लग रहा है स्वयं भगवान, मेरे साथ प्रतिक्षण हैं। आज मन शांत है। ************************ स्वरचित मौलिक रचना अर्चना श्रीवास्तव कवयित्री रायपुर, छत्तीसगढ़ ************************

बेटियां

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 ************************ बेटियां ************************ आजकल कहते कन्या उपहार। लक्ष्मी का अवतार। कन्या के जन्म पर देते हैं बधाई। कहते हैं आपके घर नन्हीं परी आई। एक वो भी दिन था। मार देते थे भ्रूण के रूप में। जला देते थे दुल्हन के रूप में। एक आज का दिन है। बेटियों को पढ़ाया जा रहा है। कॉपी किताब दिलाया जा रहा है। पहले बंद रखते थे मकान में। आज उड़ती है खुले आसमान में। आजादी ऊंचा और ऊंचा उड़ने की। पढ़ लिख कर कुछ करने की। हिम्मत बुलंदियों को छू जाने की। अपने पंखों को ज्यादा से ज्यादा फैलाने की। आओ इस आजादी का स्वागत करें। बदलाव को स्वीकारने की हिम्मत करें। इस आजादी का गुणगान करें। आओ बेटियों का सम्मान करें। ************************ स्वरचित मौलिक रचना अर्चना श्रीवास्तव कवयित्री रायपुर, छत्तीसगढ़ ************************

हो सफल

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********** हो सफल ********** हो प्रबल, हो अटल, हो अचल, हो सफल। कह रहा, धरातल, कर्म कर, हो सफल। हो सबल, पी गरल, आ निकल, हो सफल। आज अभी, ना हो कल, रुक न तू, हो सफल। तू सम्हल, तू बदल, ना चपल, हो सफल। ********** स्वरचित मौलिक रचना अर्चना श्रीवास्तव कवयित्री नवा रायपुर, छत्तीसगढ़ **********

माँ का प्यार

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 ********** माँ का प्यार ********** अपने बच्चों पर माँ अपनी ममता यूं बरसाती है। मानो यह आकाश धरा पर, वर्षा की बूंदें बरसाता। अपना आंचल फैला कर के, ऐसे प्यार लुटाती है। मानो नदियों में पवित्र जल, बिना रुके ही बहता जाता। माँ छुटपन में ही बच्चों में, संस्कार भर देती है। मानो खाद जरूरी लेकर, बीज एक पौधा बन जाता। हर एक अवस्था पर ही माँ की, छाया सिर पर रहती है। मानो धरती का संबल ले, पौधा एक पेड़ बन जाता। लाड़ लड़ाती, डांट पिलाती, कभी प्यार से समझाती। मानो कि पूरी दुनिया की, पूरी दुनिया ही है माता। बच्चे का भी जहां वहीं तक, जहाँ जहाँ दिखती है माता। मानो माँ के आकर्षण से, बच्चा खुद ही खींचता आता। ********** स्वरचित मौलिक रचना अर्चना श्रीवास्तव कवयित्री नवा रायपुर, छत्तीसगढ़ **********

रिश्ते

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 ********** रिश्ते ********** कुछ दर्द मिला, कुछ ज़ख्म मिले, कुछ अपनों के ही ताने। कुछ लोगों ने की साजिश तो, कुछ हमको लगे गिराने। कुछ लोगों ने हमसे दूरी, करने के किए बहाने। कुछ ने हमको बदनाम किया, कुछ लगे हमें ठुकराने। हमने जब उनसे पूछा तो, वो उल्टा लगे दबाने। क्यों सुनते नहीं हमारी वो, बस लगे हैं अपनी गाने। बतलाओ मैं ही पागल हूँ, या लोग हुए दीवाने। क्या हमसे उन्हें शिकायत है, क्या क्या शिकवे हैं जाने? हम फिर भी कतरन सिल सिल कर, रिश्तों को लगे बचाने। रिश्तों की कलियां चुन चुन कर, हम उनको लगे निभाने। ********** स्वरचित मौलिक रचना अर्चना श्रीवास्तव कवयित्री नवा रायपुर, छत्तीसगढ़ **********

अपना घर

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  ******************** अपना घर ******************** घर बनाना और घर पाना, हर किसी की ख्वाहिश होती है। अपने घर का मालिक बनना, हर किसी की चाहत होती है। घर नहीं होने का दर्द उनसे पूछिए, जिनके पास घर नहीं। खुद की दीवारें, खुद की छत, खुद का दर नहीं। अपने घर की कुछ यादें, कुछ सपने होते हैं। सपने में घर, बागवानी, सब अपने होते हैं। जिनके पास अपना घर नहीं, उनके सपने चकनाचूर होते हैं। हकीकत में वो सपनों से, बहुत ही दूर होते हैं। ******************** स्वरचित मौलिक रचना अर्चना श्रीवास्तव कवयित्री नवा रायपुर, छत्तीसगढ़ ********************

वतन के वीर जवान

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 ******************* वतन के वीर जवान ******************** अचूक निगाह, देश की परवाह। साहसी और बलिदानी, वीर योद्धाओं की, अमर कहानी। दुश्मनों पर विजय, न कोई डर न भय। हो देश के लिए कुरबान, करे न्यौछावर अपनी जान। सरहद पर खड़ा, बन पत्थर सा सख्त, यही तो है हमारी, आजादी की कीमत। बम बारूद से घिरे, मौत से लड़ते है, जान देकर अपनी, देश की रक्षा करते है। दिया है भारत माँ को, यही तो वचन, लुटा देंगे हम देश की, रक्षा में जानो तन। ******************** स्वरचित मौलिक रचना अर्चना श्रीवास्तव कवयित्री नवा रायपुर, छत्तीसगढ़ ********************

चाय होनी चाहिए

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  ┈┉┅━❀꧁꧂❀━┅┉┈ दिनांक: 04/07/2025 चाय होनी चाहिए ┈┉┅━❀꧁꧂❀━┅┉┈ उठते ही सुबह, हैलो हाय होनी चाहिए। एक प्याली हाथ में, चाय होनी चाहिए। सुनने वालों की भी, यही राय होनी चाहिए। गरमागरम खुशबुदार, चाय होनी चाहिए। टेन्शन तमाम हो, या हो रहा जुकाम हो। काली मिर्च, अदरक वाली, चाय होनी चाहिए। मेहमान चार हों, या वर्षा की फुहार हो, मिर्ची के पकौड़े और, चाय होनी चाहिए। ┈┉┅━❀꧁꧂❀━┅┉┈ स्वरचित एवं मौलिक रचना अर्चना श्रीवास्तव नवा रायपुर, छत्तीसगढ़ ┈┉┅━❀꧁꧂❀━┅┉┈