सम्हाल लेना राम
शीर्षक - सम्हाल लेना राम
जब हारने लगूं, तो तुम सम्हाल लेना राम।
जब गिरने लगूं, तो तुम थाम लेना करुणा-निधान।
जैसे शबरी को संवारा, जैसे अहिल्या को तारा।
वैसे मेरी नैय्या के खेवैया, तुम बन जाना पालनहार।
जब हारने लगूं ...
दुनिया गोल-गोल सी लगती है।
सही-गलत सब समझ से परे लगता है।
परिस्थितियां, तन्हाइयां भटका देती हैं।
जैसे वनवास पाकर भी तुम शांत रहे।
जैसे समुद्र देव का अहम देखकर भी तुम विनम्र रहे।
वैसे मुझे शीतलता, धीरता दे देना, नाथ।
जब हारने लगूं ...
तुमसे बड़ा ना कोई सहारा।
तुमसे बना यह धरती-गगन सारा।
जो तुम चाहो, भक्त को मित्र बना दो।
जो तुम चाहे, राजा को रंक बना दो।
जैसे जगतपिता होकर दशरथ के पुत्र बने।
जैसे सुखदाता होकर जग का सारा कष्ट सहे।
वैसे मुझमें दया, साहस भर देना, रघुनंदन।
जब हारने लगूं, तो तुम सम्हाल लेना राम।
स्वरचित कविता
तुलसी साहू
मगरलोड, धमतरी (छ.ग.)

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