मेरे दोस्त बस यही तो जिंदगानी है


मेरे दोस्त बस यही तो जिंदगानी है।

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कभी मस्ती तो कभी गुमसुम कहानी है,

मेरे दोस्त बस यही तो जिंदगानी है।



कभी आशा की किरण चमके 

कभी निराशा के बादल बनके

कभी हवाओं में खुशबू बनके

कभी आसूंओं की जवानी है।

मेरे दोस्त बस यही तो जिंदगानी है।।



कभी भीड़ में खो जाना

कभी अकेले में रो जाना

कभी रोते रोते मुस्कुराना 

कभी खुशियों की रवानी है।

मेरे दोस्त बस यही तो जिंदगानी है।।


सुबह उठना, फिर रात को सोना

रोज़ गंदा होना, फिर धोना 

उखाड़ना जड़ से दरख़तों को और फिर नए पौधों को बोना,

इसी कश्मकश में जिन्दगी बीत जानी है।

मेरे दोस्त बस यही तो जिंदगानी है।



स्वरचित रचना 

लेखक 

भारत भूषण श्रीवास्तव 

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