संदेश

जरूरत क्या थी

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आम से खास बनाने की जरूरत क्या थी? फिर ये अहसास दिलाने की जरूरत क्या थी? जो भी सोचा था वो पूरा न हुआ काम सनम, हाल ए दिल सबको बताने की ज़रूरत क्या थी? हम तो गुमनाम थे गुमनाम यूं ही जी लेते, हमको बदनाम कराने की जरूरत क्या थी? सारी दुनिया से ही मिलने लगी रुसवाई हमें, इस तरह इश्क लड़ाने की जरूरत क्या थी? बेवफ़ा बोल के जब तुझको छोड़ना था मुझे, मुझसे दिल तुझको लगाने की जरूरत क्या थी? न था मालूम कदम ऐसे बहक जाएंगे, इतना नजदीक भी आने की जरूरत क्या थी? तुमको मिलना था तो आ कर के यूं ही मिल लेते, तुम्हे कोई और बहाने की जरूरत क्या थी? मुझको जो खत्म ही करना था जहर दे देते, मेरे ईमां पे निशाने की जरूरत क्या थी? ऐसे नफ़रत से यूं दुत्कार जब भगाना था, मुझको फिर पास बुलाने की जरूरत क्या थी? पहले मुझको निकाला फिर वहीं धकेल दिया, दिल में अरमान जगाने की ज़रूरत क्या थी? कि मेरे पास में आए थे तुम मेरी सुनने, तुमको बस अपनी सुनाने की ज़रूरत क्या थी? प्लास्टर हाथ में और सिर पे भी टांके है लगे, सरे राह प्यार दिखाने की जरूरत क्या थी? उनकी चाहत है कि बस तू यूं ही बर्बाद रहे, उनसे फिर हाथ मिलाने की ज़रूरत क्या थी? त...

सांसें राम की मर्यादा पुरुषोत्तम राम की

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सांसें राम की मर्यादा पुरुषोत्तम राम की कहां सांसें अपनी थी श्री राम की। बस एक समय सारणी थी त्रेता युग में मर्यादा पुरुषोत्तम राम की।   यह एक कहानी बनी थी जब रामायण के नाम की। त्रेता युग में दशरथ के घर जन्मे चारों भैया राम की। बालपन में श्री वाल्मीकि आश्रम में लिया विद्या के संग अनुभव अपार। यही शुरुआत हुई थी मर्यादा संग संस्कार के गहरे विचार।  युवावस्था आई जब मर्यादा पुरुषोत्तम राम की। दिन दिवस वर्ष दशक बढ़ने लगी मर्यादा श्री राम की। श्री राम के नाम के साथ मर्यादा पुरुषोत्तम को जोड़ने के लिए। सांसें कम पड़ गई थी श्री राम को सीता वियोग में जोड़ने के लिए।  वनवास का संयोग सीता का वियोग लव कुश द्वारा मिले कटाक्ष भजन। इन सबको सहने के बाद किया श्री राम ने अपनी सांसों को जल में दमन।

राम गाथा

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राम गाथा बालपन की मर्यादा कैकई मां के लाडले सबसे ज्यादा। आइए सुनिए कलयुग में अनकही अनसुनी राम गाथा। ‌ श्री राम जी को पता था कि वह नारायण के अवतार भगवान थे। और अयोध्यावासी के साथ परिवार के सदस्य भी अनजान थे। कैकई मां के सबसे लाडले श्री राम थे, कुछ पिछले जन्म के अधूरे काम थे। बस इसलिए राम वनवास में कैकई मां बदनाम थी। श्री राम जी के वनवास को पंख से लेकर शंखनाद तक कैकई मां के कारण ही उड़ान मिली। अहिल्या तारण बाली मिलन गरुड़ का सहयोग यहां तक की कैकई मां के कारण ही हनुमान को भक्ति की पहचान मिली। कैकई मां के स्वार्थी स्वभाव के साथ मंथरा कानभरण सबको दिखा। क्या भरत जैसा पुत्र कौशल्या जैसी सास मांडवी जैसी पत्नी और सीता जैसी नारी का त्याग किसी को दिखा। यदि पुत्र मोह में कैकई मां का स्वभाव सामने ना आता। तब कहां कोई सुनता कलयुग में अलग पहलू से राम गाथा।

लिपटा रहूं चरणों में भगवन

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  लिपटा रहूं चरणों में भगवन =============== लिपटा रहूं चरणों में भगवन, जपता रहूं तेरा नाम प्रभु। रोजी रोटी यही हो भगवन, यही हो मेरा काम प्रभु। नींद से जागूं , नींद में जाऊं, जल पीऊं या खाना खाऊं, दौड़ रहा हूं जग के जाल में, करता रहूं तेरा ध्यान प्रभु। लिपटा रहूं चरणों में भगवन, जपता रहूं तेरा नाम प्रभु। श्वास श्वास में राम बसे हों, रोम रोम में श्याम बसे, प्राण पिता परमेश्वर मेरे, मन मंदिर हरि द्वार प्रभु। लिपटा रहूं चरणों में भगवन, जपता रहूं तेरा नाम प्रभु। पथ में अगर चलूं मैं भगवन, राम श्याम विश्राम प्रभु, मंजिल एक हो, लक्ष्य हो मेरा, नाम करूं गुणगान प्रभु। लिपटा रहूं चरणों में भगवन, जपता रहूं तेरा नाम प्रभु। रचनाकार भारत भूषण श्रीवास्तव

राम ही जानते हैं

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राम ही जानते हैं राम जी के जीवन का दुःख, राम ही जानते हैं, राम ही जानते हैं। वचन निभाने छोड़ा घर, माता कैकेयी के कहने पर। भरत को दिया राज-सिंहासन, स्वयं चले वन में रहने पर। मानव जीवन के दुःख-सुख को, वह भली-भाँति पहचानते हैं, राम जी के जीवन का दुःख, राम ही जानते हैं, राम ही जानते हैं। भ्राता भरत को देख प्रसन्न होकर, गले लगाया राम जी ने। पिता के स्वर्ग सिधारने का समाचार सुन राजा होकर भी राम जी रोए थे। स्वर्ण-मृग के पीछे जब वे दौड़े, रावण सिया को हर ले गया था। सिया ने अपने आभूषण त्याग मार्ग का संकेत दिया था। सिया की खोज की उन रातों में, कैसे राजा सोए होंगे? एक-एक दिन सिया की विरह में, अवध के राजा भी रोए होंगे। मानव जीवन की हर पीड़ा को, वह भली-भाँति पहचानते हैं। राम जी के जीवन का दुःख, राम ही जानते हैं, राम ही जानते हैं। करन बघेल.. रायपुर

जय श्री राम

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कई ज़माने बाद लिखने बैठी आज, मिला था विषय श्री राम जी पर लिखने को, फिर सोचते ही बैठ गई आखिर, लिखूं ही क्या जय श्री राम के अलावा? जिस जय श्री राम को लिखते ही, पत्थर भी तैरने लगे थे समंदर पर, और बन गया था राम सेतु। उसकी व्याख्या भला मैं कैसे करूं? जिस जय श्री राम के उच्चारण मात्र से, लांघ गए कई कोस समंदर,  को भक्त हनुमान। उसकी व्याख्या भला मैं कैसे करूं? जिस जय श्री राम के स्मरण मात्र से, नन्हीं गिलहरियों ने बना, दिया था रेत से रास्ता। उसकी व्याख्या भला मैं कैसे करूं? जिस जय श्री राम के बल से, चीर दिखाया था सीना अपना, भरी सभा में भक्त हनुमान ने। उसकी व्याख्या भला मैं कैसे करूं? जिस जय श्री राम की व्याख्या मे, ना बचेंगे दिन और रात, और न पूरेगा जीवन मेरा। उसकी व्याख्या भला मैं कैसे करूं? बस कहना चाहूं यही बात, दिल से बोलो बस एक बार, जय श्री राम बनेंगे, सबके बिगड़े काम ।

बाल राम मुस्काते हैं

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देखो बाल राम मुस्काते हैं, हृदय में सबके करुणा बरसाते हैं। धरती फूलों सी मुस्काती, हर एक खेत खुशियों से लहलहाते हैं । देखो बाल राम मुस्काते हैं, ये जन्म नहीं एक बालक का। ये तो एक नए युग का जन्म है, जन्म यही है भगवा पताके के स्थापक का । देखो बाल राम मुस्काते हैं, गोदी में खेल रहे माता के। जो नाभी से जन्माते ब्रह्मा को, चक्र सुदर्शन घुमाने वाले पिरो रहे प्रेम नातों के। देखो बाल राम मुस्काते हैं, टेढ़ी–मेढ़ी चाल चले रुनझुन रुनझुन पायल संग। जो करदे सीधा दुष्टों को अपनी एक चाल से, वो दिखा रहे संसार को अपने बालपन का रंग।