राम ही जानते हैं
राम ही जानते हैं
राम जी के जीवन का दुःख,
राम ही जानते हैं,
राम ही जानते हैं।
वचन निभाने छोड़ा घर,
माता कैकेयी के कहने पर।
भरत को दिया राज-सिंहासन,
स्वयं चले वन में रहने पर।
मानव जीवन के दुःख-सुख को,
वह भली-भाँति पहचानते हैं,
राम जी के जीवन का दुःख,
राम ही जानते हैं,
राम ही जानते हैं।
भ्राता भरत को देख प्रसन्न होकर,
गले लगाया राम जी ने।
पिता के स्वर्ग सिधारने का समाचार सुन
राजा होकर भी राम जी रोए थे।
स्वर्ण-मृग के पीछे जब वे दौड़े,
रावण सिया को हर ले गया था।
सिया ने अपने आभूषण त्याग
मार्ग का संकेत दिया था।
सिया की खोज की उन रातों में,
कैसे राजा सोए होंगे?
एक-एक दिन सिया की विरह में,
अवध के राजा भी रोए होंगे।
मानव जीवन की हर पीड़ा को,
वह भली-भाँति पहचानते हैं।
राम जी के जीवन का दुःख,
राम ही जानते हैं,
राम ही जानते हैं।
करन बघेल.. रायपुर

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