राम-केवट मिलन


***राम-केवट मिलन***


देखी थी प्रभु की सूरत, कच्छप रूप में हमने।

पर छू न पाया चरण मैं उनके युगों तक वो भाव पला अन्तर्मन में।


भाव भरे जो सृष्टि के आरंभ में, कूर्म रूप में ना मिल पाया।

युगों तक तप करके केवट रुप में जन्म लिया।


आज देखूंगा उनकी सूरत, वह कैसा मंजर होगा? 

राम लला के दर्शन होंगे, वह पल कितना सुंदर होगा?


जिनके चरणों में स्वर्ग बसा है और मुख में ब्रह्मांड जहाँ।

उन चरणों की सेवा से बढ़कर, ना कोई सम्मान यहाँ।


सुना है आपके चरणों में, भेद अनेकों छिपे हुए।

पत्थर भी नारी बन जाती, स्पर्श मात्र से प्रभु तेरे।


हे रघुवर! मैं तो अकिंचन! तरिणी-तरंगिणी में खेता हूँ।

कुटुंब जनों का इससे ही, पालन-पोषण करता हूँ।


तेरे चरण रज पड़ने से, कहीं नाव मेरी नारी बन जाए।

है भारी एक का पालन करना, दो-दो नारी कौन संभाले?


हे राम! पहले पद पंकज प्रक्षालूँ, तभी सरिता पार करूंगा।

युगों तक की है प्रतीक्षा जिनकी, वह इच्छा तो पूर्ण करूंगा।


इनके दर्शन की खातिर, ऋषि-मुनि वर्षों तप करते।

वो स्वयं आज चल कर आए, उनको छोडूं कैसे?


मन ही मन केवट सोचे, माँ गंगे! एक विनती सुन लो मेरी।

विस्तार करो तुम जल क्षेत्र का, तट ही ना आए कभी भी।


श्री राम बैठे हों नाव में मेरे, चप्पू मेरा चलता जाए।

कभी न अंत हो इस सफ़र का, तट कभी ना आए।


गंगा पार उतर कर जब उतराई देने का अवसर आया।

सीता माता ने तब अंगूठी, केवट की ओर बढ़ाया।


नहीं चाहिए कुछ मजदूरी, सब कुछ हमने पा लिया।

श्री चरणों के संस्पर्श मात्र से, त्रिभुवन का सुख भोग लिया।


फिर भी देना है तो राघव, यह मजदूरी हमारी तब चुका देना।

आऊं जब घाट तुम्हारे मैं, भवसागर पार लगा देना।


मन करता है, मन कहता है, साथ तुम्हारे हो लूं।

जीवन भर जो पाप किए,वो सारे मैं धो लूं।


मान नहीं यदि वचन का होता, जीवन भर यहीं रख लेता।

दास तेरे चरणों का बनकर अमृत घट मैं चख लेता।


जिस नाव में चरण पड़े प्रभु के, उस नाव में ना जगत बिठाऊंगा,

जिस जगह प्रभु बैठे मेरे, उस पर किसी और को ना बिठाऊंगा।


प्रभु श्री राम के दर्शन पाकर, केवट का उद्धार हुआ।

जो भी डूबा इन चरणों में, सबका बेड़ा पार हुआ।


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-कन्हैया कुमार

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