श्री राम कथा
*******" श्री राम कथा *******
चैत्र मास की नवमी आई, लेकर अद्भुत उजियारा,
राजा दशरथ के घर जन्मे, श्री राम लला प्यारा ।
गाए देव गण और ऋषि मुनि, बधाई के मंगल गीत,
जन मानस सब झूम रहे थे, सुन खुशियों भरा संगीत।
शिक्षा प्राप्ति हेतु गुरु विश्वामित्र के पास गए,
सब सीख कला कौशल, शिष्य वह खास बने।
किया ताड़का सुबाहु वध, ऋषियों का संताप हरा,
किया अंत इन असुरों का, धरती से पाप छटा ।
आए राम-लक्ष्मण गुरु विश्वामित्र के संग,
जनकपुर की नगरी में थी चारों ओर उमंग।
सीता स्वयंवर की बात सुनी, शर्त थी बहुत ही भारी,
शिव धनुष जो उठाएगा, होगी उनकी सीता प्यारी।
भूपत आए देश-देश से, दिखाने बल पौरुष भारी,
पर धनुष धरा पर धरा रहा , जनक हुए चिंताकुल भारी।
बोले विदेह व्याकुल होकर, क्या वीर-विहीन हुई धरती सारी?
नतमस्तक बैठे हो सब, क्या वैदेही रहेगी आजन्म कुँवारी?
बातें इनकी सुन लक्ष्मण गरजे, सुनिए हे मिथिलेश !
बालपन में ऐसे अनेकों धनुष तोड़े हमने, यह धनुष नहीं कुछ विशेष।
ऐसी वाणी ना बोलिए, बैठे हो श्री राम जहाँ,
धनुष तोड़ना तो कुछ नहीं, ब्रह्माण्ड उठा सकता हूँ यहाँ।
श्रीराम ने क्रोध उनका शांत कर, गुरु विश्वामित्र का आशीर्वाद लिया,
कर प्रणाम पिनाक को, क्षण भर में धनुष भंग किया।
हर्षित हुआ नगर-डगर और हर्षाए मिथिला वासी,
माला लेकर चली जनक नंदिनी, मन ही मन थी उल्लासित।
माला पहनाया गुंजी मंगल ध्वनि,
राम-सिया की जोड़ी को सत-सत नमन करे अवनी।
चारों भाई आए अयोध्या नगरी, अपनी संगिनी के संग,
खुशियाँ फैली अयोध्या में, मानो धरती पर उतरा हो वसंत।
कुटिल मंथरा ने चिकनी-चुपड़ी बातों से कैकेयी को द्रवित किया।
भरत को राजा और राम को वनवास देने के लिए भ्रमित किया।
मांगा वरदान में कैकेयी ने दशरथ से भरत के लिए राज-पाट
और निर्मम हो मांग लिया राम के लिए चौदह वर्षों का वनवास।
आहत हुए राजा दशरथ, सुन राम के वन गमन की बात।
मूर्छित होकर गिरे धरा पर, करते रहे विलाप।
"दिया राम को वन गमन का आदेश,
निकल गया हृदय, फिर भी क्यों बची है साँसें शेष!"
इतना कठोर आदेश पाकर भी, राम खड़े मुस्काए।
पितृ वचन का मान रखा, तनिक नहीं सकुचाए।
दशरथ की आँखों से अनवरत अश्रु-धारा फूट रही थी।
नियति की नीति के कारण अयोध्या पीछे छूट रही थी।
धर्म का यह रास्ता, जिसमें त्याग ही था बल।
यही थी राम की ताकत, जो सहे हृदय विदारक पल ।
भरत के लिए कैकेयी की आसक्ति देख, मन में विरक्ति छाई।
'राम-राम' करते-करते, दशरथ के सम्मुख मृत्यु आई।
प्रभु चरणों की सेवा का केवट को अमृत दान मिला।
भवसागर से पार उतरने का प्रभु से वरदान मिला।
पंचवटी की कुटिया में राम, लक्ष्मण और सीता रहते तीन महान,
तीनों मिलकर बना रहे इस कुटिया को स्वर्ग समान।
कुटिया की छवि थी अनुपम, शांत और निराली।
तभी नियति ने भेजा, स्वर्ण मृग मनोहारी।
उसे पाने की इच्छा, सीता ने प्रबल दिखाई।
"ला दो नाथ इस मृग को," कई बार गुहार लगाई।
सीता की ज़िद खातिर स्वर्ण मृग का पीछा किया।
कर मारीच का वध, सब माया नष्ट किया।
इतने में रावण ने छल से, सीता का हरण किया।
प्रभु व्याकुल हो ढूंढे, पर ना पता मिला।
मन था व्याकुल अधीर,
तभी मिले हनुमत संग सुग्रीव, मिले वानर ,भालू ,ऋक्ष सब हैं प्रतापी वीर।
बाली का अंत कर वीरता का मिसाल दिया।
सब राज-पाठ सुग्रीव को सौंप, मित्रता का उपहार दिया॥
जटायु और हनुमान से सीता का पता चला,
लंका में हैं जानकी, हृदय में विषाद भरा।
सागर तट पर जाकर प्रभु ने विनय किया।
बोले, "रास्ता दे दो," पर सागर न मान दिया।
उठा ज्वार क्रोध का तब, जग में हाहाकार मचा।
प्रकट हुए सागर, नतमस्तक, ना कोई गर्व बचा।
सर चाप चढ़ा प्रभु ने बल का प्रमाण दिया।
क्षमा दान देकर, संयम का ज्ञान दिया।
राम नाम की महिमा से, पत्थर पानी पर तैर गया,
रह गई दुनिया दंग, सेतु कैसे बांध दिया !
वानर सेना संग राम ने लंका में प्रवेश किया।
अंगद को भेज शांति का प्रस्ताव दिया॥
पर ना माना रावण, प्रस्ताव का अंत किया,
अंगद का अपमान कर, सुनिश्चित लंका का विध्वंस किया।
जमाया अंगद ने पाँव, बोले "हिला तनिक भी जगह से,
तो समझो हार गए हैं राम, लौट जाएँगे यहाँ से।"
सब योद्धा उठकर आए, पर पैर ना डिग पाया।
उनकी शक्ति के आगे, सबने शीश झुकाया।
रावण की मति बिगड़ी, स्वयं पैर पकड़ने आया।
उपहास कर अंगद ने, पैर पीछे हटाया।
बोले, "रावण! सुन!"जाकर पाँव पकड़ उनके,
वह त्रिभुवन नाथ हरि, तेरी भूल क्षमा कर देंगे।"
रावण का दर्प चूर करने युद्ध का उद्घोष हुआ।
जय श्री राम की ध्वनि से, चारों ओर जयघोष हुआ।
दिव्य बाण राम ने साधा, देखा देवों ने होकर मौन।
इनके पराक्रम के आगे अब टिकेगा कौन?
किया सर्वनाश रावण का, सत्य की जीत हुई प्रचंड।
धर्म के हाथों से सदैव हुआ अधर्म का अंत।
जीत हुई धर्म की, अन्याय का हुआ सर्वनाश।
विश्व पटल पर फैला, राम राज्य का प्रकाश।
अधर्म कितना हो बलशाली, ना धर्म के आगे टिक पाएगा।
असत्य का मिटा कर तम, सत्य ही सदैव जगमगाएगा॥
*****कन्हैया कुमार*****

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