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राम गाथा

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राम गाथा बालपन की मर्यादा कैकई मां के लाडले सबसे ज्यादा। आइए सुनिए कलयुग में अनकही अनसुनी राम गाथा। ‌ श्री राम जी को पता था कि वह नारायण के अवतार भगवान थे। और अयोध्यावासी के साथ परिवार के सदस्य भी अनजान थे। कैकई मां के सबसे लाडले श्री राम थे, कुछ पिछले जन्म के अधूरे काम थे। बस इसलिए राम वनवास में कैकई मां बदनाम थी। श्री राम जी के वनवास को पंख से लेकर शंखनाद तक कैकई मां के कारण ही उड़ान मिली। अहिल्या तारण बाली मिलन गरुड़ का सहयोग यहां तक की कैकई मां के कारण ही हनुमान को भक्ति की पहचान मिली। कैकई मां के स्वार्थी स्वभाव के साथ मंथरा कानभरण सबको दिखा। क्या भरत जैसा पुत्र कौशल्या जैसी सास मांडवी जैसी पत्नी और सीता जैसी नारी का त्याग किसी को दिखा। यदि पुत्र मोह में कैकई मां का स्वभाव सामने ना आता। तब कहां कोई सुनता कलयुग में अलग पहलू से राम गाथा।

लिपटा रहूं चरणों में भगवन

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  लिपटा रहूं चरणों में भगवन =============== लिपटा रहूं चरणों में भगवन, जपता रहूं तेरा नाम प्रभु। रोजी रोटी यही हो भगवन, यही हो मेरा काम प्रभु। नींद से जागूं , नींद में जाऊं, जल पीऊं या खाना खाऊं, दौड़ रहा हूं जग के जाल में, करता रहूं तेरा ध्यान प्रभु। लिपटा रहूं चरणों में भगवन, जपता रहूं तेरा नाम प्रभु। श्वास श्वास में राम बसे हों, रोम रोम में श्याम बसे, प्राण पिता परमेश्वर मेरे, मन मंदिर हरि द्वार प्रभु। लिपटा रहूं चरणों में भगवन, जपता रहूं तेरा नाम प्रभु। पथ में अगर चलूं मैं भगवन, राम श्याम विश्राम प्रभु, मंजिल एक हो, लक्ष्य हो मेरा, नाम करूं गुणगान प्रभु। लिपटा रहूं चरणों में भगवन, जपता रहूं तेरा नाम प्रभु। रचनाकार भारत भूषण श्रीवास्तव

राम ही जानते हैं

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राम ही जानते हैं राम जी के जीवन का दुःख, राम ही जानते हैं, राम ही जानते हैं। वचन निभाने छोड़ा घर, माता कैकेयी के कहने पर। भरत को दिया राज-सिंहासन, स्वयं चले वन में रहने पर। मानव जीवन के दुःख-सुख को, वह भली-भाँति पहचानते हैं, राम जी के जीवन का दुःख, राम ही जानते हैं, राम ही जानते हैं। भ्राता भरत को देख प्रसन्न होकर, गले लगाया राम जी ने। पिता के स्वर्ग सिधारने का समाचार सुन राजा होकर भी राम जी रोए थे। स्वर्ण-मृग के पीछे जब वे दौड़े, रावण सिया को हर ले गया था। सिया ने अपने आभूषण त्याग मार्ग का संकेत दिया था। सिया की खोज की उन रातों में, कैसे राजा सोए होंगे? एक-एक दिन सिया की विरह में, अवध के राजा भी रोए होंगे। मानव जीवन की हर पीड़ा को, वह भली-भाँति पहचानते हैं। राम जी के जीवन का दुःख, राम ही जानते हैं, राम ही जानते हैं। करन बघेल.. रायपुर

जय श्री राम

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कई ज़माने बाद लिखने बैठी आज, मिला था विषय श्री राम जी पर लिखने को, फिर सोचते ही बैठ गई आखिर, लिखूं ही क्या जय श्री राम के अलावा? जिस जय श्री राम को लिखते ही, पत्थर भी तैरने लगे थे समंदर पर, और बन गया था राम सेतु। उसकी व्याख्या भला मैं कैसे करूं? जिस जय श्री राम के उच्चारण मात्र से, लांघ गए कई कोस समंदर,  को भक्त हनुमान। उसकी व्याख्या भला मैं कैसे करूं? जिस जय श्री राम के स्मरण मात्र से, नन्हीं गिलहरियों ने बना, दिया था रेत से रास्ता। उसकी व्याख्या भला मैं कैसे करूं? जिस जय श्री राम के बल से, चीर दिखाया था सीना अपना, भरी सभा में भक्त हनुमान ने। उसकी व्याख्या भला मैं कैसे करूं? जिस जय श्री राम की व्याख्या मे, ना बचेंगे दिन और रात, और न पूरेगा जीवन मेरा। उसकी व्याख्या भला मैं कैसे करूं? बस कहना चाहूं यही बात, दिल से बोलो बस एक बार, जय श्री राम बनेंगे, सबके बिगड़े काम ।

बाल राम मुस्काते हैं

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देखो बाल राम मुस्काते हैं, हृदय में सबके करुणा बरसाते हैं। धरती फूलों सी मुस्काती, हर एक खेत खुशियों से लहलहाते हैं । देखो बाल राम मुस्काते हैं, ये जन्म नहीं एक बालक का। ये तो एक नए युग का जन्म है, जन्म यही है भगवा पताके के स्थापक का । देखो बाल राम मुस्काते हैं, गोदी में खेल रहे माता के। जो नाभी से जन्माते ब्रह्मा को, चक्र सुदर्शन घुमाने वाले पिरो रहे प्रेम नातों के। देखो बाल राम मुस्काते हैं, टेढ़ी–मेढ़ी चाल चले रुनझुन रुनझुन पायल संग। जो करदे सीधा दुष्टों को अपनी एक चाल से, वो दिखा रहे संसार को अपने बालपन का रंग।

श्री राम कथा

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*******" श्री राम कथा ******* चैत्र मास की नवमी आई, लेकर अद्भुत उजियारा, राजा दशरथ के घर जन्मे, श्री राम लला प्यारा । गाए देव गण और ऋषि मुनि, बधाई के मंगल गीत, जन मानस सब झूम रहे थे, सुन खुशियों भरा संगीत। शिक्षा प्राप्ति हेतु गुरु विश्वामित्र के पास गए, सब सीख कला कौशल, शिष्य वह खास बने। किया ताड़का सुबाहु वध, ऋषियों का संताप हरा, किया अंत इन असुरों का, धरती से पाप छटा । आए राम-लक्ष्मण गुरु विश्वामित्र के संग, जनकपुर की नगरी में थी चारों ओर उमंग। सीता स्वयंवर की बात सुनी, शर्त थी बहुत ही भारी, शिव धनुष जो उठाएगा, होगी उनकी सीता प्यारी। भूपत आए देश-देश से, दिखाने बल पौरुष भारी, पर धनुष धरा पर धरा रहा , जनक हुए चिंताकुल भारी। बोले विदेह व्याकुल होकर, क्या वीर-विहीन हुई धरती सारी? नतमस्तक बैठे हो सब, क्या वैदेही रहेगी आजन्म कुँवारी? बातें इनकी सुन लक्ष्मण गरजे, सुनिए हे मिथिलेश ! बालपन में ऐसे अनेकों धनुष तोड़े हमने, यह धनुष नहीं कुछ विशेष। ऐसी वाणी ना बोलिए, बैठे हो श्री राम जहाँ, धनुष तोड़ना तो कुछ नहीं, ब्रह्माण्ड उठा सकता हूँ यहाँ। श्रीराम ने क्रोध उनका शांत कर, गुरु विश्वामित्र...

माता जानकी

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माता जानकी  (सीता हरण का दृश्य) जब बात हो रघुकुल के मान- सम्मान की  लगने कैसे देती कलंक कुलवधू माता जानकी  कोई बंधन नहीं, कोई सीमा नहीं,  वह तो थी महज सुरक्षा रेखा समझकर तपस्वी रावण को माता ने कदम रेखा पार रखा  आरंभ अपने अंत का उसी क्षण कर लिया  जिस क्षण रावण ने सीता हर लिया सकल समाज यह कुप्रश्न उठाए लक्ष्मण रेखा भी जिसे सुरक्षित न रख पाए लंका में रही वही सीता भला  कैसे पवित्र कहलाए? दावे से मैं एक बात कहती हूं  सुन लो सत्य मैं आज कहती हूं  व्यर्थ है अपनों का लगाया  सीमा और सुरक्षा रेखा नारी नहीं सुरक्षित तब तक  जब तक वह स्वयं न रख ले अपने सम्मुख  सबल -सक्षम -सशक्त एक तिनका  लांछन नारी पर सदा से ही  लगते हैं, लगाते हैं  निर्दोष को ही लोग दोषी बताते हैं  अग्निपरीक्षा से पीछे क्यों हटती माता  जो हटती पीछे तो उनके प्रेम पर भी लांछन लग जाता  आराध्य पर लगा लांछन कोई भक्त कैसे सहेगा  हो चाहे परीक्षा अग्नि की वह हंसते-हंसते देगा हर युग में अवतरित होती जनक सुता  प्रेम से जनकपुर, सींचती संस्कारों ...