माता जानकी
माता जानकी
(सीता हरण का दृश्य)
जब बात हो रघुकुल के मान- सम्मान की
लगने कैसे देती कलंक कुलवधू माता जानकी
कोई बंधन नहीं, कोई सीमा नहीं,
वह तो थी महज सुरक्षा रेखा
समझकर तपस्वी रावण को माता ने
कदम रेखा पार रखा
आरंभ अपने अंत का उसी क्षण कर लिया
जिस क्षण रावण ने सीता हर लिया
सकल समाज यह कुप्रश्न उठाए
लक्ष्मण रेखा भी जिसे सुरक्षित न रख पाए
लंका में रही वही सीता भला
कैसे पवित्र कहलाए?
दावे से मैं एक बात कहती हूं
सुन लो सत्य मैं आज कहती हूं
व्यर्थ है अपनों का लगाया
सीमा और सुरक्षा रेखा
नारी नहीं सुरक्षित तब तक
जब तक वह स्वयं न रख ले अपने सम्मुख
सबल -सक्षम -सशक्त एक तिनका
लांछन नारी पर सदा से ही
लगते हैं, लगाते हैं
निर्दोष को ही लोग दोषी बताते हैं
अग्निपरीक्षा से पीछे क्यों हटती माता
जो हटती पीछे तो उनके प्रेम पर भी
लांछन लग जाता
आराध्य पर लगा लांछन कोई भक्त कैसे सहेगा
हो चाहे परीक्षा अग्नि की वह हंसते-हंसते देगा
हर युग में अवतरित होती जनक सुता
प्रेम से जनकपुर, सींचती संस्कारों से अयोध्या
सामर्थ्य इतना कि परिवार स्वयं संभाल ले
समर्पण इतना कि निज अस्तित्व का भी बलिदान दे
त्याग, शौर्य और श्रृंगार है मां जानकी
समग्र सृष्टि का आधार है मां जानकी।
© यामिनी सूर्यजा

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