मुख्तलिफ अंजाम होगा


 मुख्तलिफ आगाज है तो मुख्तलिफ अंजाम होगा।

या तो होगा नामवर या कि बहुत बदनाम होगा।


चार कंधों पर चला है जिंदगी को छोड़कर वो,

बाद मरने के ही जैसे कब्र में आराम होगा।


अपने कातिल को भी जन्नत से दुआएं दे रहा वो,

क्या पता है कि खुदा का भी यही पैग़ाम होगा।


चाहिए दो ग़ज़ ज़मीं उत्पात इतना क्यों मगर,

लग रहा है कल ज़मीं का कोहिनूरी दाम होगा।


आज दिल टूटा है उसका रो रहा है अब तलक,

शाम हाथों में जहर या फिर छलकता ज़ाम होगा।


आएगा एक रोज ऐसा राम तू चिंता न कर,

दुश्मनों की भी जुबां पर तेरा ही कलाम होगा।



┈┉┅━❀꧁꧂❀━┅┉┈

स्वरचित मौलिक रचना

रामचन्द्र श्रीवास्तव

कवि, गीतकार एवं लेखक

नवा रायपुर, छत्तीसगढ़

संपर्क सूत्र: 6263926054

┈┉┅━❀꧁꧂❀━┅┉┈

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

पत्रकारों के लिए विशेष रचना

रिश्ते

ज़रूरत