जल रहा है सभी का नशेमन
जल रहा है सभी का नशेमन, शख्स कोई सलामत नहीं है।
उसपे महंगाई का दौर देखो, क्या ये जनता की आफत नहीं है?
सच की आवाज जब तुम उठाते, तुमको धमकाते हर आते जाते।
घर में डर के दुबक बैठ जाना, ये कहीं की शराफत नहीं है।
काले धन को कमाना पचाना, है बड़ी बात सुन जानेजाना।
ऊंट के मुँह में तुम डालो जीरा, मिलती थोड़ी भी राहत नहीं है।
लोग कुछ हैं जो कहते हैं करते, और किसी से भी बिल्कुल न डरते।
कथनी करनी अगर एक है तो, तुमको आती सियासत नहीं है।
धर्म के नाम पर तोड़ते हो, क्यों नहीं तुम हमें जोड़ते हो?
देश को बाँटना चाहते हो, ये तुम्हारी रियासत नहीं है।
बिक रहे हैं कई लिखने वाले, सच हुआ झूठ के अब हवाले।
खींचकर सच को बाहर निकाले, क्या किसी में ये जुर्रत नहीं है?
आदमी क्यों बना है मवाली, देता हर बात पर क्यों है गाली?
आजकल आदमी की जुबां पर, रत्ती भर भी नफासत नहीं है।
ना किसी को किसी से है मतलब, खुद में डूबे हुए हैं यहाँ सब।
लग रहा है किसी को किसी की, अब यहाँ पर ज़रूरत नहीं है।
माना कुछ पल को तुम गिर गए हो, और मुश्किल से तुम घिर गए हो।
आपदा में भी अवसर निकालो, फिर तो कोई मुसीबत नहीं है।
है बहुत भोला बचपन का जीवन, तू है गुल और बचपन है गुलशन।
जिसकी माता पिता के अलावा, करता कोई हिफाज़त नहीं है।
माँ पिता ने ये जीवन संवारा, और गुरु ने दिया ज्ञान सारा।
इनकी पूजा से बढ़कर के बंदे, इस जहां में इबादत नहीं है।
हर किसी पर नजर तुम न डालो, अपने मन को ज़रा तुम संभालो।
जो पराए का धन चाहता है, उसकी किस्मत में बरकत नहीं है।
देते बूढ़े बड़े सीख तुझको, गाँठ में बांध के रख तू उसको।
नींव के बिन जहां में कहीं भी, टिकती कोई इमारत नहीं है।
अपने बाजू पे कर के भरोसा, है चला रात दिन तू हमेशा।
तूने मेहनत से जो भी कमाया, वो किसी की अमानत नहीं है।
मैने मजमून खत का पढ़ा है, तुमने मजबूर हो कर लिखा है।
अच्छी तरह से तुमसे हूँ वाकिफ, ये तुम्हारी इबारत नहीं है।
मैं हूँ अपनी ही मर्ज़ी का मालिक, मेरे ऊपर है बस मेरा खालिक।
मुझको मजबूर करने की सोचो, इसकी तुमको इजाज़त नहीं है।
आज शायर हैं कुछ नाक वाले, थोड़े अड़ियल बड़ी धाक वाले।
जिनके लफ्जों से दिल दुख रहा है, शायरी में नजाकत नहीं है।
तेरी खुशियों में नजदीक आता, दौर ए गर्दिश में मुँह को छिपाता।
तुम जिसे कह रहे हो तुम्हारा, उसमें बिल्कुल उल्फत नहीं है।
तुमको जाना था कह देते मुझसे, इस तरह ना निकल जाते खुद से।
मुझको इसके अलावा कसम से, तुमसे कोई शिकायत नहीं है।
हुस्न वालों से जाकर के कहना, और तुम भी खबरदार रहना।
इश्क वाले भी हैं हम यहाँ पर, उनकी पूरी हुकूमत नहीं है।
क्या हुआ तूने छोड़ा मुझे गर, भूल आया मैं वो सारे मंजर।
इतने वर्षों अकेला रहा हूँ, अब मुझे तेरी आदत नहीं है।
तुमने मुझको कहाँ कब है जाना, मैं हूँ कातिल या हूँ मैं दीवाना।
मैं तुम्हारे जेहन में हूँ जैसा, वैसी मेरी हकीकत नहीं है।
देख कर रो रहा है बहुत कुछ, झूठ को लोग कहते हैं सचमुच।
राम को लग रहा है ये दुनिया, ज़िंदा रहने के बाबत नहीं है।
पूछता अब मुझे ये शहर है, आपके प्यार का ये असर है।
वरना मैं राम अदना सा शायर, ये मेरी शान ओ शौकत नहीं है।
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स्वरचित मौलिक रचना
रामचन्द्र श्रीवास्तव
कवि, गीतकार एवं लेखक
नवा रायपुर, छत्तीसगढ़
संपर्क सूत्र: 6263926054
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