मेरी खामोशियां
मेरी खामोशियां ही ढाल भी हथियार भी है।
मेरी खामोशियां ही दुश्मनों पर वार भी है।
ज़ुबां खामोश रह कर बोलती हैं आज कल तो,
मेरी खामोशियां मेरी जुबां की धार भी है।
बहुत कुछ बोलना भी तो वजह है डूबने की,
मेरी खामोशियां मुझ नाव की पतवार भी है।
मेरी पहचान भी लोगों में संजीदा है अब तो,
मेरी खामोशियां व्यक्तित्व का श्रृंगार भी है।
बहुत लोगों के मुंह मैं आजकल लगता नहीं हूँ,
मेरी खामोशियां ही क्रोध भी प्रहार भी है।
मेरी मौजूदगी से ही निपट जाते हैं कुछ तो,
मेरी खामोशियां ही युद्ध की ललकार भी है।
बहुत से राज़ सीने में दफन गहराइयों तक,
मेरी खामोशियां कुछ लोगों की रखवार भी है।
वो ताने दे रहे जिनका रहा अहसान मुझ पर,
मेरी खामोशियां उनके प्रति आभार भी है।
बहुत से दोस्त हैं जो बांधते तारीफ के पुल,
मेरी खामोशियां पहचानती गद्दार भी है।
कि अब सुन "राम" तू अहसान न लेना किसी का,
मेरी खामोशियां कहने लगी खुद्दार भी है।
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स्वरचित मौलिक रचना
रामचन्द्र श्रीवास्तव
कवि, गीतकार एवं लेखक
नवा रायपुर, छत्तीसगढ़
संपर्क सूत्र: 6263926054
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