जल रहा है सभी का नशेमन, शख्स कोई सलामत नहीं है। उसपे महंगाई का दौर देखो, क्या ये जनता की आफत नहीं है? सच की आवाज जब तुम उठाते, तुमको धमकाते हर आते जाते। घर में डर के दुबक बैठ जाना, ये कहीं की शराफत नहीं है। काले धन को कमाना पचाना, है बड़ी बात सुन जानेजाना। ऊंट के मुँह में तुम डालो जीरा, मिलती थोड़ी भी राहत नहीं है। लोग कुछ हैं जो कहते हैं करते, और किसी से भी बिल्कुल न डरते। कथनी करनी अगर एक है तो, तुमको आती सियासत नहीं है। धर्म के नाम पर तोड़ते हो, क्यों नहीं तुम हमें जोड़ते हो? देश को बाँटना चाहते हो, ये तुम्हारी रियासत नहीं है। बिक रहे हैं कई लिखने वाले, सच हुआ झूठ के अब हवाले। खींचकर सच को बाहर निकाले, क्या किसी में ये जुर्रत नहीं है? आदमी क्यों बना है मवाली, देता हर बात पर क्यों है गाली? आजकल आदमी की जुबां पर, रत्ती भर भी नफासत नहीं है। ना किसी को किसी से है मतलब, खुद में डूबे हुए हैं यहाँ सब। लग रहा है किसी को किसी की, अब यहाँ पर ज़रूरत नहीं है। माना कुछ पल को तुम गिर गए हो, और मुश्किल से तुम घिर गए हो। आपदा में भी अवसर निकालो, फिर तो कोई मुसीबत नहीं है। है बहुत भोला बचपन का...