संदेश

"युवान" आए हैं

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  साथ तो है परिवार का, दोस्तों का, सहकर्मीयों और अपनों का। भाग दौड़ में जिंदगी व्यस्त नही अस्त व्यस्त है, आखिर पीछा जो कर रहे हैं सपनों का । इस जिंदगी की दौड़ में, तभी मिली एक छांव। जब नन्हें मेहमान के, घर में पड़े पांव। जिंदगी को सुकून का मरहम लग गया। दिन तो यूं गुजरने लगे मानो, पर लग गया। उसकी हर मुस्कान से जिंदगी में रंग यूं भरा हुआ, मानो सूने बादल में इंद्रधनुष हो बना हुआ। संदेशे बांटने खुशियों के नन्हें मेहमान आए हैं, हम खुश हैं आज बहुत मेरे घर "युवान" आए हैं।

मैं इस युग का नहीं हूँ

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मैं इस युग का नहीं हूँ  मेरे जुबान पर तो हर समय राम राम है  हर नारी का मेरी नजरों सिर्फ सम्मान है  हाँ मैं शायद त्रेता युग का ही हूँ  मैं इस युग का नहीं हूँ  त्रेता युग में माँ का सम्मान था  लेकिन इस युग में नारी का अपमान है  त्रेता युग में माँ के लिए बेटे ने 14 वर्ष वनवास किया  इस युग में माँ तो वृद्धा आश्रम जा रही है  त्रेता युग में माँ ने वनवास में शिक्षा दे कर सबको  सम्मानित करवाया  इस युग में पैसे दे कर भी शिक्षा का कोई मोल नहीं है  त्रेता युग में नारी ने अग्नि परीक्षा दे कर पति का सम्मान बचाया  लेकिन इस युग में नारी तो पति को नीले ड्रम में डाल रही है  त्रेता युग के राज में राम थे जिनके चरणों में चारो धाम थे  इस युग में चारो धाम है  मगर किसी के जुबान पर राम नहीं  राम के राज्य में असुरों का बोल बाला है  यहाँ माँ के लिए बहन के लिए सिर्फ अभद्र भाषाए आती है लोगो के जुबान पर छोटी छोटी बातो पर माँ बहन को ला रहे है इस राम के पावन धरा को लोग  राक्षसों का गड़ बना रहे है  मज़ाक बना कर रख दिए है ...

ज़िन्दगी सी बन गया है

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चिराग़ ए रौशनी बन ज़िन्दगी सी बन गया है। वो मेरे वास्ते एक शायरी सी बन गया है। हक़ीक़त है कि या है एक कहानी अक्स मेरा, अजब वो एक पहेली मुख्तलिफ सी बन गया है। बुरा वो दौर था भुला नहीं हूँ अब तलक जो, चुनांचे डर मेरा मेरी कमी सी बन गया है। तेरा बेखौफ अंदाज़ ए बयां भाता है मुझको, तेरा मासूम सा चेहरा खुशी सी बन गया है। तुझे इनकार करने की नहीं हिम्मत ज़रा भी, मेरा गर्दन हिलाना भी नहीं सी बन गया है। अधूरापन हुआ काफ़ूर जब से आ गया तू, तू मेरा आसमां मेरी ज़मीं सी बन गया है। ┈┉┅━❀꧁꧂❀━┅┉┈ स्वरचित मौलिक रचना रामचन्द्र श्रीवास्तव कवि, गीतकार एवं लेखक नवा रायपुर, छत्तीसगढ़ संपर्क सूत्र: 6263926054 ┈┉┅━❀꧁꧂❀━┅┉┈

मेरी खामोशियां

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  मेरी खामोशियां ही ढाल भी हथियार भी है। मेरी खामोशियां ही दुश्मनों पर वार भी है। ज़ुबां खामोश रह कर बोलती हैं आज कल तो, मेरी खामोशियां मेरी जुबां की धार भी है। बहुत कुछ बोलना भी तो वजह है डूबने की, मेरी खामोशियां मुझ नाव की पतवार भी है। मेरी पहचान भी लोगों में संजीदा है अब तो, मेरी खामोशियां व्यक्तित्व का श्रृंगार भी है। बहुत लोगों के मुंह मैं आजकल लगता नहीं हूँ, मेरी खामोशियां ही क्रोध भी प्रहार भी है। मेरी मौजूदगी से ही निपट जाते हैं कुछ तो, मेरी खामोशियां ही युद्ध की ललकार भी है। बहुत से राज़ सीने में दफन गहराइयों तक, मेरी खामोशियां कुछ लोगों की रखवार भी है। वो ताने दे रहे जिनका रहा अहसान मुझ पर, मेरी खामोशियां उनके प्रति आभार भी है। बहुत से दोस्त हैं जो बांधते तारीफ के पुल, मेरी खामोशियां पहचानती गद्दार भी है। कि अब सुन "राम" तू अहसान न लेना किसी का, मेरी खामोशियां कहने लगी खुद्दार भी है। ┈┉┅━❀꧁꧂❀━┅┉┈ स्वरचित मौलिक रचना रामचन्द्र श्रीवास्तव कवि, गीतकार एवं लेखक नवा रायपुर, छत्तीसगढ़ संपर्क सूत्र: 6263926054 ┈┉┅━❀꧁꧂❀━┅┉┈

मेरा भी तो किरदार होगा

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कहानी में कहीं मेरा भी तो किरदार होगा, जहाँ मैं जंगजू जुल्मी मगर संसार होगा। समय लेता हूँ पूरा और बहुत कुछ सोचता हूँ, कि किस तरह से यह वार असरदार होगा। मैं अपने दोस्तों पर भी नज़र रखने लगा हूँ, न जाने कौन, कब, किस बात पर गद्दार होगा। तड़पता छोड़ उसको दूर तक मैं चल दिया हूँ, मगर अब सोचता हूँ वो बहुत लाचार होगा। जुबां के ज़ोर से उस पर सितम ही कर रहा हूँ, मेरे भीतर का मैं उसका ही गुनहगार होगा। मैं जब बीते हुए लम्हों में खुद को देखता हूँ, मुझे दिखता नहीं मुझसा कोई खूंखार होगा। मोहल्ले में गमों की परत मोटी देखता हूँ, न जाने कब यहाँ खुशियों का पारावार होगा। मैं साजिश भूल कर उसको मुआफी दे चुका हूँ, मगर वो खुद की ही नजरों में शर्मशार होगा। अगर मैं हाथ पर यूं हाथ रखकर बैठता हूँ, तो फिर किस तरह से दुनियावी कारोबार होगा। किए अपराध जितने भी दुहाई मांगता हूँ, कि इस तरह ही तेरा "राम" अब उद्धार होगा। ┈┉┅━❀꧁꧂❀━┅┉┈ स्वरचित मौलिक रचना रामचन्द्र श्रीवास्तव कवि, गीतकार एवं लेखक नवा रायपुर, छत्तीसगढ़ संपर्क सूत्र: 6263926054 ┈┉┅━❀꧁꧂❀━┅┉┈

जल रहा है सभी का नशेमन

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  जल रहा है सभी का नशेमन, शख्स कोई सलामत नहीं है। उसपे महंगाई का दौर देखो, क्या ये जनता की आफत नहीं है? सच की आवाज जब तुम उठाते, तुमको धमकाते हर आते जाते। घर में डर के दुबक बैठ जाना, ये कहीं की शराफत नहीं है। काले धन को कमाना पचाना, है बड़ी बात सुन जानेजाना। ऊंट के मुँह में तुम डालो जीरा, मिलती थोड़ी भी राहत नहीं है। लोग कुछ हैं जो कहते हैं करते, और किसी से भी बिल्कुल न डरते। कथनी करनी अगर एक है तो, तुमको आती सियासत नहीं है। धर्म के नाम पर तोड़ते हो, क्यों नहीं तुम हमें जोड़ते हो? देश को बाँटना चाहते हो, ये तुम्हारी रियासत नहीं है। बिक रहे हैं कई लिखने वाले, सच हुआ झूठ के अब हवाले। खींचकर सच को बाहर निकाले, क्या किसी में ये जुर्रत नहीं है? आदमी क्यों बना है मवाली, देता हर बात पर क्यों है गाली? आजकल आदमी की जुबां पर, रत्ती भर भी नफासत नहीं है। ना किसी को किसी से है मतलब, खुद में डूबे हुए हैं यहाँ सब। लग रहा है किसी को किसी की, अब यहाँ पर ज़रूरत नहीं है। माना कुछ पल को तुम गिर गए हो, और मुश्किल से तुम घिर गए हो। आपदा में भी अवसर निकालो, फिर तो कोई मुसीबत नहीं है। है बहुत भोला बचपन का...

मुख्तलिफ अंजाम होगा

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 मुख्तलिफ आगाज है तो मुख्तलिफ अंजाम होगा। या तो होगा नामवर या कि बहुत बदनाम होगा। चार कंधों पर चला है जिंदगी को छोड़कर वो, बाद मरने के ही जैसे कब्र में आराम होगा। अपने कातिल को भी जन्नत से दुआएं दे रहा वो, क्या पता है कि खुदा का भी यही पैग़ाम होगा। चाहिए दो ग़ज़ ज़मीं उत्पात इतना क्यों मगर, लग रहा है कल ज़मीं का कोहिनूरी दाम होगा। आज दिल टूटा है उसका रो रहा है अब तलक, शाम हाथों में जहर या फिर छलकता ज़ाम होगा। आएगा एक रोज ऐसा राम तू चिंता न कर, दुश्मनों की भी जुबां पर तेरा ही कलाम होगा। ┈┉┅━❀꧁꧂❀━┅┉┈ स्वरचित मौलिक रचना रामचन्द्र श्रीवास्तव कवि, गीतकार एवं लेखक नवा रायपुर, छत्तीसगढ़ संपर्क सूत्र: 6263926054 ┈┉┅━❀꧁꧂❀━┅┉┈