सरहदों के राम


सरहदों के राम


त्याग दी पिता की विरासत 

माता के आंचल से हुए दूर 

उन्होंने त्याग दिए निज महल 

प्रिय के आस भी हो गए चकनाचूर 

नहीं यह माता कैकई का आदेश नहीं 

यह त्याग मां भारती के नाम है 

खड़े हैं जो सरहदों पर वह भी तो राम हैं ।


वे रखते सदा माता का मान

न्योछावर करते निज प्राण 

सीता स्वयंवर के धनु बाण हैं 

अहिल्या के तपोफल का परिणाम हैं 

जन-जन के नायक जन-जन का गान हैं 

जिस कुटिया में जन्मे पावन वह धाम है 

खड़े हैं जो सरहदों पर वह भी तो राम हैं


मातृभूमि की रक्षा में 

जल-थल-नभ नाप लिया 

“अहिंसा परमो धर्म: 

धर्म हिंसा तदैव च” 

जाप लिया,

 वो सौम्यवान, शौर्यवान 

होकर दिनकर,

सरल दीप सा ताप दिया 

रघुकुल के संस्कारों 

के ही परिणाम हैं 

खड़े हैं जो सरहदों पर 

वे भी तो राम हैं।।


© यामिनी सूर्यजा

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