उदासी


आज फिर वही अधबने पुल को

 उदासी की हालत में छोड़कर 

मैं घर की और निकला


शाम भी तो उदास ही थी


और रुका 

मैं जाकर सड़क के उस उदास हिस्से में


जहां मैंने कभी विदा की थी अपनी तमाम खुशियां


थोड़ा आगे बढ़ा

 और

 वहीं सड़क के किनारे वो पीपल का पेड़

 उदासी समेटे खड़ा हुआ दिखाई दिया


ये वही तो नही हां पर उस जैसा जरूर है


जिसके तले हमने अपना सारा बचपन 

सपने बुनते हुए गुज़ार दिया


मैने फोन निकाला


उसमें मेरी तस्वीर नहीं थी


बस थे तो कुछ उदास चेहरे


तमाम गैलरी की तस्वीरें खंगाली

 पर


कहीं मुझे उदासी से परे 

कुछ न मिला


और अगर मिल भी जाता


तो क्या उसमें मुझे, 

मैं मिलता


 शायद नहीं


यही सवाल

 और 

मेरी मरी हुई सारी खुशियां लेकर 

उदासी को वापिस जेब में रखकर 

मैं घर आ गया ।।

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