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जरूरत क्या थी

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आम से खास बनाने की जरूरत क्या थी? फिर ये अहसास दिलाने की जरूरत क्या थी? जो भी सोचा था वो पूरा न हुआ काम सनम, हाल ए दिल सबको बताने की ज़रूरत क्या थी? हम तो गुमनाम थे गुमनाम यूं ही जी लेते, हमको बदनाम कराने की जरूरत क्या थी? सारी दुनिया से ही मिलने लगी रुसवाई हमें, इस तरह इश्क लड़ाने की जरूरत क्या थी? बेवफ़ा बोल के जब तुझको छोड़ना था मुझे, मुझसे दिल तुझको लगाने की जरूरत क्या थी? न था मालूम कदम ऐसे बहक जाएंगे, इतना नजदीक भी आने की जरूरत क्या थी? तुमको मिलना था तो आ कर के यूं ही मिल लेते, तुम्हे कोई और बहाने की जरूरत क्या थी? मुझको जो खत्म ही करना था जहर दे देते, मेरे ईमां पे निशाने की जरूरत क्या थी? ऐसे नफ़रत से यूं दुत्कार जब भगाना था, मुझको फिर पास बुलाने की जरूरत क्या थी? पहले मुझको निकाला फिर वहीं धकेल दिया, दिल में अरमान जगाने की ज़रूरत क्या थी? कि मेरे पास में आए थे तुम मेरी सुनने, तुमको बस अपनी सुनाने की ज़रूरत क्या थी? प्लास्टर हाथ में और सिर पे भी टांके है लगे, सरे राह प्यार दिखाने की जरूरत क्या थी? उनकी चाहत है कि बस तू यूं ही बर्बाद रहे, उनसे फिर हाथ मिलाने की ज़रूरत क्या थी? त...

सांसें राम की मर्यादा पुरुषोत्तम राम की

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सांसें राम की मर्यादा पुरुषोत्तम राम की कहां सांसें अपनी थी श्री राम की। बस एक समय सारणी थी त्रेता युग में मर्यादा पुरुषोत्तम राम की।   यह एक कहानी बनी थी जब रामायण के नाम की। त्रेता युग में दशरथ के घर जन्मे चारों भैया राम की। बालपन में श्री वाल्मीकि आश्रम में लिया विद्या के संग अनुभव अपार। यही शुरुआत हुई थी मर्यादा संग संस्कार के गहरे विचार।  युवावस्था आई जब मर्यादा पुरुषोत्तम राम की। दिन दिवस वर्ष दशक बढ़ने लगी मर्यादा श्री राम की। श्री राम के नाम के साथ मर्यादा पुरुषोत्तम को जोड़ने के लिए। सांसें कम पड़ गई थी श्री राम को सीता वियोग में जोड़ने के लिए।  वनवास का संयोग सीता का वियोग लव कुश द्वारा मिले कटाक्ष भजन। इन सबको सहने के बाद किया श्री राम ने अपनी सांसों को जल में दमन।

राम गाथा

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राम गाथा बालपन की मर्यादा कैकई मां के लाडले सबसे ज्यादा। आइए सुनिए कलयुग में अनकही अनसुनी राम गाथा। ‌ श्री राम जी को पता था कि वह नारायण के अवतार भगवान थे। और अयोध्यावासी के साथ परिवार के सदस्य भी अनजान थे। कैकई मां के सबसे लाडले श्री राम थे, कुछ पिछले जन्म के अधूरे काम थे। बस इसलिए राम वनवास में कैकई मां बदनाम थी। श्री राम जी के वनवास को पंख से लेकर शंखनाद तक कैकई मां के कारण ही उड़ान मिली। अहिल्या तारण बाली मिलन गरुड़ का सहयोग यहां तक की कैकई मां के कारण ही हनुमान को भक्ति की पहचान मिली। कैकई मां के स्वार्थी स्वभाव के साथ मंथरा कानभरण सबको दिखा। क्या भरत जैसा पुत्र कौशल्या जैसी सास मांडवी जैसी पत्नी और सीता जैसी नारी का त्याग किसी को दिखा। यदि पुत्र मोह में कैकई मां का स्वभाव सामने ना आता। तब कहां कोई सुनता कलयुग में अलग पहलू से राम गाथा।

लिपटा रहूं चरणों में भगवन

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  लिपटा रहूं चरणों में भगवन =============== लिपटा रहूं चरणों में भगवन, जपता रहूं तेरा नाम प्रभु। रोजी रोटी यही हो भगवन, यही हो मेरा काम प्रभु। नींद से जागूं , नींद में जाऊं, जल पीऊं या खाना खाऊं, दौड़ रहा हूं जग के जाल में, करता रहूं तेरा ध्यान प्रभु। लिपटा रहूं चरणों में भगवन, जपता रहूं तेरा नाम प्रभु। श्वास श्वास में राम बसे हों, रोम रोम में श्याम बसे, प्राण पिता परमेश्वर मेरे, मन मंदिर हरि द्वार प्रभु। लिपटा रहूं चरणों में भगवन, जपता रहूं तेरा नाम प्रभु। पथ में अगर चलूं मैं भगवन, राम श्याम विश्राम प्रभु, मंजिल एक हो, लक्ष्य हो मेरा, नाम करूं गुणगान प्रभु। लिपटा रहूं चरणों में भगवन, जपता रहूं तेरा नाम प्रभु। रचनाकार भारत भूषण श्रीवास्तव

राम ही जानते हैं

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राम ही जानते हैं राम जी के जीवन का दुःख, राम ही जानते हैं, राम ही जानते हैं। वचन निभाने छोड़ा घर, माता कैकेयी के कहने पर। भरत को दिया राज-सिंहासन, स्वयं चले वन में रहने पर। मानव जीवन के दुःख-सुख को, वह भली-भाँति पहचानते हैं, राम जी के जीवन का दुःख, राम ही जानते हैं, राम ही जानते हैं। भ्राता भरत को देख प्रसन्न होकर, गले लगाया राम जी ने। पिता के स्वर्ग सिधारने का समाचार सुन राजा होकर भी राम जी रोए थे। स्वर्ण-मृग के पीछे जब वे दौड़े, रावण सिया को हर ले गया था। सिया ने अपने आभूषण त्याग मार्ग का संकेत दिया था। सिया की खोज की उन रातों में, कैसे राजा सोए होंगे? एक-एक दिन सिया की विरह में, अवध के राजा भी रोए होंगे। मानव जीवन की हर पीड़ा को, वह भली-भाँति पहचानते हैं। राम जी के जीवन का दुःख, राम ही जानते हैं, राम ही जानते हैं। करन बघेल.. रायपुर

जय श्री राम

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कई ज़माने बाद लिखने बैठी आज, मिला था विषय श्री राम जी पर लिखने को, फिर सोचते ही बैठ गई आखिर, लिखूं ही क्या जय श्री राम के अलावा? जिस जय श्री राम को लिखते ही, पत्थर भी तैरने लगे थे समंदर पर, और बन गया था राम सेतु। उसकी व्याख्या भला मैं कैसे करूं? जिस जय श्री राम के उच्चारण मात्र से, लांघ गए कई कोस समंदर,  को भक्त हनुमान। उसकी व्याख्या भला मैं कैसे करूं? जिस जय श्री राम के स्मरण मात्र से, नन्हीं गिलहरियों ने बना, दिया था रेत से रास्ता। उसकी व्याख्या भला मैं कैसे करूं? जिस जय श्री राम के बल से, चीर दिखाया था सीना अपना, भरी सभा में भक्त हनुमान ने। उसकी व्याख्या भला मैं कैसे करूं? जिस जय श्री राम की व्याख्या मे, ना बचेंगे दिन और रात, और न पूरेगा जीवन मेरा। उसकी व्याख्या भला मैं कैसे करूं? बस कहना चाहूं यही बात, दिल से बोलो बस एक बार, जय श्री राम बनेंगे, सबके बिगड़े काम ।

बाल राम मुस्काते हैं

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देखो बाल राम मुस्काते हैं, हृदय में सबके करुणा बरसाते हैं। धरती फूलों सी मुस्काती, हर एक खेत खुशियों से लहलहाते हैं । देखो बाल राम मुस्काते हैं, ये जन्म नहीं एक बालक का। ये तो एक नए युग का जन्म है, जन्म यही है भगवा पताके के स्थापक का । देखो बाल राम मुस्काते हैं, गोदी में खेल रहे माता के। जो नाभी से जन्माते ब्रह्मा को, चक्र सुदर्शन घुमाने वाले पिरो रहे प्रेम नातों के। देखो बाल राम मुस्काते हैं, टेढ़ी–मेढ़ी चाल चले रुनझुन रुनझुन पायल संग। जो करदे सीधा दुष्टों को अपनी एक चाल से, वो दिखा रहे संसार को अपने बालपन का रंग।

श्री राम कथा

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*******" श्री राम कथा ******* चैत्र मास की नवमी आई, लेकर अद्भुत उजियारा, राजा दशरथ के घर जन्मे, श्री राम लला प्यारा । गाए देव गण और ऋषि मुनि, बधाई के मंगल गीत, जन मानस सब झूम रहे थे, सुन खुशियों भरा संगीत। शिक्षा प्राप्ति हेतु गुरु विश्वामित्र के पास गए, सब सीख कला कौशल, शिष्य वह खास बने। किया ताड़का सुबाहु वध, ऋषियों का संताप हरा, किया अंत इन असुरों का, धरती से पाप छटा । आए राम-लक्ष्मण गुरु विश्वामित्र के संग, जनकपुर की नगरी में थी चारों ओर उमंग। सीता स्वयंवर की बात सुनी, शर्त थी बहुत ही भारी, शिव धनुष जो उठाएगा, होगी उनकी सीता प्यारी। भूपत आए देश-देश से, दिखाने बल पौरुष भारी, पर धनुष धरा पर धरा रहा , जनक हुए चिंताकुल भारी। बोले विदेह व्याकुल होकर, क्या वीर-विहीन हुई धरती सारी? नतमस्तक बैठे हो सब, क्या वैदेही रहेगी आजन्म कुँवारी? बातें इनकी सुन लक्ष्मण गरजे, सुनिए हे मिथिलेश ! बालपन में ऐसे अनेकों धनुष तोड़े हमने, यह धनुष नहीं कुछ विशेष। ऐसी वाणी ना बोलिए, बैठे हो श्री राम जहाँ, धनुष तोड़ना तो कुछ नहीं, ब्रह्माण्ड उठा सकता हूँ यहाँ। श्रीराम ने क्रोध उनका शांत कर, गुरु विश्वामित्र...

माता जानकी

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माता जानकी  (सीता हरण का दृश्य) जब बात हो रघुकुल के मान- सम्मान की  लगने कैसे देती कलंक कुलवधू माता जानकी  कोई बंधन नहीं, कोई सीमा नहीं,  वह तो थी महज सुरक्षा रेखा समझकर तपस्वी रावण को माता ने कदम रेखा पार रखा  आरंभ अपने अंत का उसी क्षण कर लिया  जिस क्षण रावण ने सीता हर लिया सकल समाज यह कुप्रश्न उठाए लक्ष्मण रेखा भी जिसे सुरक्षित न रख पाए लंका में रही वही सीता भला  कैसे पवित्र कहलाए? दावे से मैं एक बात कहती हूं  सुन लो सत्य मैं आज कहती हूं  व्यर्थ है अपनों का लगाया  सीमा और सुरक्षा रेखा नारी नहीं सुरक्षित तब तक  जब तक वह स्वयं न रख ले अपने सम्मुख  सबल -सक्षम -सशक्त एक तिनका  लांछन नारी पर सदा से ही  लगते हैं, लगाते हैं  निर्दोष को ही लोग दोषी बताते हैं  अग्निपरीक्षा से पीछे क्यों हटती माता  जो हटती पीछे तो उनके प्रेम पर भी लांछन लग जाता  आराध्य पर लगा लांछन कोई भक्त कैसे सहेगा  हो चाहे परीक्षा अग्नि की वह हंसते-हंसते देगा हर युग में अवतरित होती जनक सुता  प्रेम से जनकपुर, सींचती संस्कारों ...

सरहदों के राम

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सरहदों के राम त्याग दी पिता की विरासत  माता के आंचल से हुए दूर  उन्होंने त्याग दिए निज महल  प्रिय के आस भी हो गए चकनाचूर  नहीं यह माता कैकई का आदेश नहीं  यह त्याग मां भारती के नाम है  खड़े हैं जो सरहदों पर वह भी तो राम हैं । वे रखते सदा माता का मान न्योछावर करते निज प्राण  सीता स्वयंवर के धनु बाण हैं  अहिल्या के तपोफल का परिणाम हैं  जन-जन के नायक जन-जन का गान हैं  जिस कुटिया में जन्मे पावन वह धाम है  खड़े हैं जो सरहदों पर वह भी तो राम हैं मातृभूमि की रक्षा में  जल-थल-नभ नाप लिया  “अहिंसा परमो धर्म:  धर्म हिंसा तदैव च”  जाप लिया,  वो सौम्यवान, शौर्यवान  होकर दिनकर, सरल दीप सा ताप दिया  रघुकुल के संस्कारों  के ही परिणाम हैं  खड़े हैं जो सरहदों पर  वे भी तो राम हैं।। © यामिनी सूर्यजा

राम वनवास नहीं जाते तो

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।। राम वनवास नहीं जाते तो ।।              ✍️ विरेन्द्र शर्मा "अनुज" """"""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""" यदि माता कैकेयी, ना होती, तो राम वनवास, नहीं जाते। ना ही सीता, हरण हुआ होता, ना रावण ही, मारा जाता। ऐसी बहुत सी भ्रांतियां, बहुधा, मानव मन में, लगा उठने। समझ में जिसकी, जो आया, अपनी अपनी सोच, रखा उसने। कृष्ण ने कहा, सुनो अर्जुन, जो कहते युद्ध नहीं, करोगे तुम। तब भी सब, मारे जायेंगे, किसी भ्रम में नहीं, पड़ो ना तुम। भगवदगीता का, हरेक शब्द, ब्रह्म से निकला, ज्ञान है। होनी तो पहले से, तय होता, कर्म प्रेरणा से, होता संज्ञान है। यदि राम, वनवास नहीं जाते, तो राजा राम, मृगया को जाते। तब ...

राम जन्म भूमि

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।।राम जन्म भूमि।।                   ✍️ विरेन्द्र शर्मा “अनुज” “”””””””””””””””””“””””””””””””””””””””””””” भारत भूमि अवधपुर गावहिं,              आज अयोध्या धाम कहावहिं!  विराज रहे हैं प्रभु निज धामा,               कौशिल्या सुत रघुकुल रामा!!  ढोल मृदंग मंजीरा साजे,                 शंख नगाड़ा दुंदुभि बाजे!  सजा अयोध्या दुल्हन जैसे,           पुलकित लोग बरनन करूँ कैसे!!  जिनके नाम काल डर जाहिं,        सोई दशरथ के राम कहावहिं!  बाल रूप तुम्ह करहु निवासा,           बेगि हरो प्रभु तम सब दासा!!  बरस पांच सौ कैसे बीता,               बिन तुम्हरे सरजू था रीता!  आज प्रभु तुम अति सुख दीन्हा,               भगतन की पीड़ा हर ...

रामनाम-नामावलि

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।। रामनाम-नामावलि।।                               ✍️ विरेन्द्र शर्मा “अनुज” “”””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””” राम नाम से आंखें खुलती, आंखें बंद करें तो राम। राम बिना पत्ते ना हिलते,गिनती का आरंभ ही राम।। दादा राम पोता राम दादा के परदादा राम। काका राम बेटा राम, मामा राम भांचा राम।। दयाराम पुनिराम , ढालुराम गयाराम। आजूराम साजूराम, कालूराम मयाराम।। गन्नूराम धन्नुराम, झाड़ूराम जीतूराम। हीराराम मोतीराम, पूनाराम गीतूराम।। दुजराम तीजराम, चैतराम बैसाखूराम। झड़ीराम जेठूराम,कार्तिकराम फागूराम।। मंशाराम टीकाराम,खेलनराम मेलनराम। सीताराम गीताराम,भूलनराम झूलनराम।। रामपुकार रामबिशाल,रामदयाल रामकृपाल। रामप्रसाद रामनिवास,रामसनेही रामनिहाल।। रामकृष्ण रामकुमार, रामभरोसे रामअवतार। रामचरण रामशरण, रामनिशाद रामअधार।। रामानुज रामाचार्य, रामेश्वर रामपाल। रामाश्रय रामनिहोरे,रामाधीन रामलाल।। शिवराम विष्णुराम, हरेराम हरिराम। धनदराम सनदराम,कलिराम बलीराम।। धनउराम बनऊराम, सन...

अर्जी सुन लो राम

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मेरी अर्जी सुन लो राम, मेरा जीवन सफल कर दो। संग-संग चल लो राम, मेरी राह सरल कर दो। पापी हूँ मैं, अधमी हूँ, प्रभु, तेरा ही सहारा है। ना आस रहा जग का, सब कुछ ही दिखावा है। मेरी नाव डूबी मझधार, प्रभु, आके बचा लेना। हे कृपा सिंधु दाता, जग के पालन कर्ता। कभी धैर्य ना खोयें हम, बस पकड़ें धर्म रस्ता। आहत हूँ जग से, तेरा ही सहारा है। शिव धनुष भंग करके, प्रभु सीता संग ब्याह रचा। नहीं कोई था जग में, जो धनुष उठा सका। न तुमसा कोई वीर, ना कोई ज्ञानी होगा। शबरी के बेर का मीठापन, तुमसे है भगवन। केवट का ज़िद्दीपन, तुमसे है भगवन। मेरी नैया पार लगाओ प्रभु, बड़ी दूर किनारा है। रख मान वचन का तुम, वन-वन भटके हो राम। सहनशील और त्याग में, अग्रणी हो राम। मर्यादित रहकर तुम, मर्यादा सिखाते हो। कर बाली का अंत, मित्रता का मिसाल दिया। मृत शीला को जिला करके, अहिल्या का उद्धार किया। मेरे अधर में अटके प्राण, प्रभु, आके बचा लेना। पंछी का कलरव तुमसे, बगिया में महक तुमसे। है चांद में शीतलता, सूरज में तपन तुमसे। जिस ओर नज़र जाता,तेरा ही नज़ारा है। अब तेरे सिवा रघुवर , कोई ना हमारा है।

उदासी

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आज फिर वही अधबने पुल को  उदासी की हालत में छोड़कर  मैं घर की और निकला शाम भी तो उदास ही थी और रुका  मैं जाकर सड़क के उस उदास हिस्से में जहां मैंने कभी विदा की थी अपनी तमाम खुशियां थोड़ा आगे बढ़ा  और  वहीं सड़क के किनारे वो पीपल का पेड़  उदासी समेटे खड़ा हुआ दिखाई दिया ये वही तो नही हां पर उस जैसा जरूर है जिसके तले हमने अपना सारा बचपन  सपने बुनते हुए गुज़ार दिया मैने फोन निकाला उसमें मेरी तस्वीर नहीं थी बस थे तो कुछ उदास चेहरे तमाम गैलरी की तस्वीरें खंगाली  पर कहीं मुझे उदासी से परे  कुछ न मिला और अगर मिल भी जाता तो क्या उसमें मुझे,  मैं मिलता  शायद नहीं यही सवाल  और  मेरी मरी हुई सारी खुशियां लेकर  उदासी को वापिस जेब में रखकर  मैं घर आ गया ।।

राम राम

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राम सिर्फ़ नाम नहीं है, उसके बिना होता कोई काम नहीं है। सुबह उठकर अगर राम कहूँ, तो दिन मेरा अच्छा हो जाता है। दादा जी से अगर राम-राम कहूँ, तो चेहरे पर मेरे निखार आता है। पड़ोसियों को अगर राम-राम कहूँ, तो उनके साथ रिश्ता अच्छा बन जाता है। दोस्तों को कॉल पर राम-राम कहने से, बात करने की शुरुआत अच्छी हो जाती है। राम का नाम सबके सामने लो, तो खुद का आचरण अच्छा कहलाता है। राम का नाम हर समय लो, तो ज़िंदगी राममय बन जाती है। विदेश की यात्रा पर भी मैं, राम की धरा का कहलाता हूँ। राम के आचरण को अपनाऊँ, तो सबके हृदय को भाता हूँ। राम के गुण अपनाकर मैं, सब दोस्तों को वही सिखाऊँगा। नशा करने वालों को भी, मैं राम के गुण सिखाऊँगा। नशे की लत छुड़वाकर, उन्हें मर्यादा में लाऊँगा। सियावर रामचंद्र की जय राम राम लेखक: करन बघेल

राम के अंदर का भाव

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राम वो नहीं जो द्वेष से भरा हो।  राम वह मन है जो गिरे हुए लोगो को भी प्रेम से भरता हो।  राम वो नहीं जो जीतकर अकड़पन लाए।  राम वो है जो हारकर भी कदमों को आगे बढ़ाए।   राम वो नहीं जो झूठ का सहारा लेता हो।  राम वो है जो सच बोलने की हिम्मत रखता हो।  राम वो नहीं जो अपमान की याद दिलाता हो।  राम वो है जो अपमान सहकर भी अपमानित नहीं होने को सूचित करता हो।  राम वो नहीं जो अपने स्वार्थ से चलता हो।  राम वो है जो बिना बोले दूसरों के दर्द को अपना मानकर बिना बोले सहता हो।  राम वो नहीं जहाँ दुर्भावना हो।  राम वो है जहाँ दिलो में अच्छे विचार हों।  राम वो नहीं जहाँ दुष्ट भाव हों।  राम वो है जहाँ निर्मल भाव हर श्वास में और हर पुकार में हो।  राम वहाँ नहीं जहाँ छल -कपट हो।  राम वो है जो अपनी करुणा से राग द्वेष को भी मिटाता हो।  राम वहाँ नहीं, जहाँ सोने का सिंहासन हो।  राम वहाँ है जहाँ मन में, दिलो में , सदा सच्चे विचार हों।  लिखने के लिए और भी है जहाँ राम की लीला अपरम्पार हो।  ऐसा रूप लाल का हो , ऐसा ही राम हर मन ...

राम कौन है?

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राम वो है जो शांत है।  राम वो है जो प्रेम का पुजारी है।  राम वो है है जो सत्ता में होकर जनता की सुनता हो।  राम वो है जो नैतिकता पर चलता है।  राम वो है जो सुंदरता का प्रतीक है।  राम वो है जो दुःख को हराता है।  राम वो है जो जीवन का मार्गदर्शक है।  राम वो है जो जीवन ज्ञाता है।  राम वो है जो धर्म को निभाता है।  राम वो है जो संकल्प का पालन करता है। राम वो है जो जीवन जीने की एक कला है।  राम वो है जहाँ मन का सुंदर भाव है।  राम वो है जहाँ नैतिकता उसके अंदर है।  राम वो है जो सम्मान का प्रतीक है।  राम वो है जो धर्म पर चलता है।  राम वो है जो सत्य पर चलता है।                                             राम वो है जो व्यर्थ भीड़ को भगाता है।  राम वो है जो सद्गुणी मन का प्रतीक है।  राम ऐसा एक भाव है जिस भाव को लोग पसंद करते है।                        ...

क्या सहज है

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क्या सहज है धरती पर मानव का अवतार लेना। क्या सहज है त्रेता में मर्यादा का भार लेना। अयोध्या की धरा पर खेला, तीन मांओं का लाड़ पाया, दशरथ की आंखों का तारा,  रघुकुल का दीपक उजियारा, राजतिलक के शुभ अवसर पर,  भवन छोड़ वन स्वीकार करना। क्या सहज है धरती पर... जनक राज की दुलारी सीता, मधुर बोल, कंचन-सी काया, चारों पहर दास-दासी जिन्हें घेरे, कष्ट जिन्हें कोई छू न पाए, प्राणप्रिये उस जानकी से, सीता हरण का बिछोह सहना। क्या सहज है धरती पर...   लखन-सा भ्राता न दूजा, हर कष्ट मेरा, बांट वो लेता मां की ममता, पत्नी का प्यार  सब तज दिया, बस सेवा आधार  शाक्ति-बाण जब लगा लक्ष्मण को, काल से प्राण की गुहार करना।  क्या सहज है धरती पर.. क्या सहज है त्रेता में मर्यादा का भार लेना। स्वरचित कविता  तुलसी साहू  मगरलोड धमतरी (छ.ग.)

सम्हाल लेना राम

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शीर्षक - सम्हाल लेना राम जब हारने लगूं, तो तुम सम्हाल लेना राम। जब गिरने लगूं, तो तुम थाम लेना करुणा-निधान। जैसे शबरी को संवारा, जैसे अहिल्या को तारा। वैसे मेरी नैय्या के खेवैया, तुम बन जाना पालनहार। जब हारने लगूं ... दुनिया गोल-गोल सी लगती है। सही-गलत सब समझ से परे लगता है। परिस्थितियां, तन्हाइयां भटका देती हैं। जैसे वनवास पाकर भी तुम शांत रहे। जैसे समुद्र देव का अहम देखकर भी तुम विनम्र रहे। वैसे मुझे शीतलता, धीरता दे देना, नाथ। जब हारने लगूं ... तुमसे बड़ा ना कोई सहारा। तुमसे बना यह धरती-गगन सारा। जो तुम चाहो, भक्त को मित्र बना दो। जो तुम चाहे, राजा को रंक बना दो। जैसे जगतपिता होकर दशरथ के पुत्र बने। जैसे सुखदाता होकर जग का सारा कष्ट सहे। वैसे मुझमें दया, साहस भर देना, रघुनंदन। जब हारने लगूं, तो तुम सम्हाल लेना राम। स्वरचित कविता  तुलसी साहू  मगरलोड, धमतरी (छ.ग.)

राम-केवट मिलन

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***राम-केवट मिलन*** देखी थी प्रभु की सूरत, कच्छप रूप में हमने। पर छू न पाया चरण मैं उनके युगों तक वो भाव पला अन्तर्मन में। भाव भरे जो सृष्टि के आरंभ में, कूर्म रूप में ना मिल पाया। युगों तक तप करके केवट रुप में जन्म लिया। आज देखूंगा उनकी सूरत, वह कैसा मंजर होगा?  राम लला के दर्शन होंगे, वह पल कितना सुंदर होगा? जिनके चरणों में स्वर्ग बसा है और मुख में ब्रह्मांड जहाँ। उन चरणों की सेवा से बढ़कर, ना कोई सम्मान यहाँ। सुना है आपके चरणों में, भेद अनेकों छिपे हुए। पत्थर भी नारी बन जाती, स्पर्श मात्र से प्रभु तेरे। हे रघुवर! मैं तो अकिंचन! तरिणी-तरंगिणी में खेता हूँ। कुटुंब जनों का इससे ही, पालन-पोषण करता हूँ। तेरे चरण रज पड़ने से, कहीं नाव मेरी नारी बन जाए। है भारी एक का पालन करना, दो-दो नारी कौन संभाले? हे राम! पहले पद पंकज प्रक्षालूँ, तभी सरिता पार करूंगा। युगों तक की है प्रतीक्षा जिनकी, वह इच्छा तो पूर्ण करूंगा। इनके दर्शन की खातिर, ऋषि-मुनि वर्षों तप करते। वो स्वयं आज चल कर आए, उनको छोडूं कैसे? मन ही मन केवट सोचे, माँ गंगे! एक विनती सुन लो मेरी। विस्तार करो तुम जल क्षेत्र का, तट ही ना ...

मेरे आसमां का चांद

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शीर्षक - मेरे आसमां का चांद मेरी कमियां मुझे ही पूरा करने दे,  मेरे आसमां का चांद मुझे ही बनने दे।  जिंदगी अगर युद्धभूमि है,  तो मेरी लड़ाई मुझे ही लड़ने दे। मेरे आसमां का चांद ...... थोड़ा गिरने दे, थोड़ा रोने दे,  अगर हालात और जज्बात इम्तिहान लेते हैं, तो बेशक मुझे इन मुश्किलों से गुजरने दे। मेरे आसमां का चांद .... सुना है हार, आलोचनाएं और लोग हौसला तोड़ देते हैं, सहते-सहते सब्र भी साथ छोड़ देते हैं, टूट-टूट कर मुझे खुद को जोड़ने दे। मेरे आसमां का चांद....  अक्सर सपनों और जिम्मेदारियों के बीच जंग चलती हैं,  सपनें अपनी ओर खींचते हैं, और ये जिम्मेदारियां सपनों से दूर करती हैं, मुझे सपनों और जिम्मेदारियों का साथ निभाने दे।  मेरे आसमां का चांद..... इतनी उम्मीद तो है जिंदगी से, हर रात सवेरा लाती है, हर ठोकर मंजिल तक पहुंचने का पैगाम देती है, मेरे संघर्ष से मुझे मेरा इतिहास रचने दे। मेरे आसमां का चांद मुझे ही बनने दे। स्वरचित कविता  तुलसी साहू  मगरलोड, धमतरी छग

हो मनुज राम सा

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************************ शीर्षक: हो मनुज राम सा ************************ हो सरल राम सा, मेरे श्री राम सा। राम की हो कृपा, हो मनुज राम सा। माँ-पिता के लिए वन गमन कर लिया। जब गुरु ने कहा सिय वरण कर लिया। पुत्र हो राम सा, शिष्य हो राम सा। वर हो श्री राम सा, हो मनुज राम सा। संग लखन को, भरत को सिंहासन दिए। मित्र सुग्रीव का दुख निवारण किए। भाई हो राम सा, मित्र हो राम सा। राम की हो कृपा, हो मनुज राम सा। भक्त बजरंग बली उनके सेवक प्रथम। उनकी शिव भक्ती का साक्षी रामेश्वरम। हो प्रभु राम सा, भक्त हो राम सा। राम की हो कृपा, हो मनुज राम सा। ************************ स्वरचित मौलिक रचना अर्चना श्रीवास्तव कवयित्री रायपुर, छत्तीसगढ़ ************************

मेरे दोस्त बस यही तो जिंदगानी है

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मेरे दोस्त बस यही तो जिंदगानी है। ---------------------------------- कभी मस्ती तो कभी गुमसुम कहानी है, मेरे दोस्त बस यही तो जिंदगानी है। कभी आशा की किरण चमके  कभी निराशा के बादल बनके कभी हवाओं में खुशबू बनके कभी आसूंओं की जवानी है। मेरे दोस्त बस यही तो जिंदगानी है।। कभी भीड़ में खो जाना कभी अकेले में रो जाना कभी रोते रोते मुस्कुराना  कभी खुशियों की रवानी है। मेरे दोस्त बस यही तो जिंदगानी है।। सुबह उठना, फिर रात को सोना रोज़ गंदा होना, फिर धोना  उखाड़ना जड़ से दरख़तों को और फिर नए पौधों को बोना, इसी कश्मकश में जिन्दगी बीत जानी है। मेरे दोस्त बस यही तो जिंदगानी है। स्वरचित रचना  लेखक  भारत भूषण श्रीवास्तव  ---------------------

तो बोलो जय श्री राम

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राम नाम की धूम मची है भज ले तू भी राम भज ले तू भी राम प्यारे  भज ले तू भी राम   तो बोलो जय श्री राम राम हैं तेरे, राम हैं मेरे  राम ही हैं संसार  तो बोलो जय श्री राम  मन मंदिर में राम बसा ले, राम का कर ले ध्यान तो बोलो जय श्री राम  राम नाम हो, राम ही धाम हो राम करें कल्याण  तो बोलो जय श्री राम  राम मिले तो राम मिलेंगे  राम पे कर विश्वास  तो बोलो जय श्री राम राम नाम की धूम मची है भज ले तू भी राम भज ले तू भी राम प्यारे भज ले तू भी राम  तो बोलो जय श्री राम लेखक (राम कृपा से स्वरचित रचना) भारत भूषण श्रीवास्तव

जय श्री राम, जय श्री राम

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************************ शीर्षक: जय श्री राम, जय श्री राम ************************ एक ही नारा, एक ही नाम, जय श्री राम, जय श्री राम। पुण्य प्रतापी एक ही धाम, जय श्री राम, जय श्री राम। वट की छाया जब हो घाम, जय श्री राम, जय श्री राम। सबके दाता राजा राम, जय श्री राम, जय श्री राम। अवधपुरी के राजपुत्र हैं, चलते ठुमक ठुमक कर। सब जन उनका दर्शन चाहें, चाहे दुबक दुबक कर। सबके राजदुलारे राम, जय श्री राम, जय श्री राम। सबके दाता राजा राम, जय श्री राम, जय श्री राम। माता पिता की आज्ञा पाकर, बन बैठे वनवासी। उनके ना होने पर पूरे अवध में आज उदासी। दशरथ रोज पुकारें राम, जय श्री राम, जय श्री राम। सबके दाता राजा राम, जय श्री राम, जय श्री राम। धर्म पताका लहराने को पृथ्वी लोक में आए। असुर जनों के अत्याचार से साधू संत बचाए। विष्णु के अवतारी राम, जय श्री राम, जय श्री राम। सबके दाता राजा राम, जय श्री राम, जय श्री राम। ************************ स्वरचित मौलिक रचना अर्चना श्रीवास्तव कवयित्री रायपुर, छत्तीसगढ़ ************************

मर्द

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शीर्षक - मर्द  क्यों कहते हैं कि मर्द को दर्द नहीं होता? कौन कहता है की लड़के रोते नहीं? भावनाएं, संवेदनाएं तो उनमें भी होती हैं, घर की याद, अपनों की उम्मीदें, उनको भी तो सताती हैं। और इतना सख्त मजबूत कैसे बना दिया हमने, उनके जज्बातों को लड़का समझ नजर अंदाज करके। तुम बस अपना सपना पूरा करो,  पैसे की परवाह मत करो, ये कहने वाला,  उनके नसीब में कहां होता है। दिल उनका भी तो टूटता है, कोशिशें उनकी भी तो हारती हैं,  परेशानियां उनको भी तो बेचैन करती हैं, और अपनों का साथ, घर की याद,  उनको भी तो सताती है। फिर कैसे दर्द ना हो मर्द को, और कैसे छलके न आंखें लड़कों की। उन्हें शिकायतों से परे समझने वाला चाहिए,  सही-गलत, जीत-हार से परे अपनाने वाला चाहिए,  उन्हें गले लगकर रो लेने दो, दिल की बात खुलकर कह लेने दो। क्योंकि मर्द को दर्द होता है, और लड़के भी रोते हैं। ✍️ स्वरचित कविता  तुलसी साहू  मगरलोड, धमतरी छग

आज मन शांत है

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************************ शीर्षक: आज मन शांत है ************************ अहम की दीवार गिर चुकी है, विचार शुद्ध हैं। लोगों की आलोचना से भी, मन नहीं क्रुद्ध है। आज मन शांत है। लोग क्या कह रहे हैं, कोई फर्क नहीं। कहीं कोई उलझन, तर्क, कुतर्क नहीं। आज मन शांत है। दैनिक गृहकार्य रुचिकर हैं, नहीं कोई खिन्नता। हृदय में है तो केवल, प्रसन्नता ही प्रसन्नता। आज मन शांत है। संतोष भी, खुशी भी, स्वयं पर नियंत्रण है। लग रहा है स्वयं भगवान, मेरे साथ प्रतिक्षण हैं। आज मन शांत है। ************************ स्वरचित मौलिक रचना अर्चना श्रीवास्तव कवयित्री रायपुर, छत्तीसगढ़ ************************

जय श्री राम

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राम तो केवल नाम नहीं है, ये तो नामों का धाम है। सांस है जो इस जीव जगत का, वो तो जय श्री राम है। एक कदम हम चल ना पाएं  पाँव अगर बेजान हैं। पानी में जो रस्ता बना दे, वो ही नाम तो राम है। सांस है जो इस जीव जगत का वो तो जय श्री राम है। जीवन है भाई एक तपस्या, तप जीवन आधार है। शिव भी जिनका ध्यान लगाएं वो मेरे श्री राम हैं। सांस है जो इस जीव जगत का वो तो जय श्री राम है। दशरथ ढूंढे, केवट पाए, दास बने हनुमान हैं। शबरी के नैनों के आंसू  गाते राम का नाम हैं। सांस है जो इस जीव जगत का वो तो जय श्री राम है। चंचल जीवन, मदमस्त है ये मन, मन को न विश्राम है। मन को भी मुक्ति से जोड़े, मन में गर श्री राम हैं। सांस है जो इस जीव जगत का वो तो जय श्री राम है। ✍️ स्वरचित रचना  भारत भूषण श्रीवास्तव

मैं भी रचनाकार

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  . ।। मैं भी रचनाकार ।।                              ✍️ विरेन्द्र शर्मा (रायपुर) “””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””""""" मेरी रचनाएं अब, लेने लगीं आकार है, जल ही मेरी प्रेरणा, जल ही मेरा आधार है। जल तो जल है, न कोई रंग ना स्वाद, जल ही जीवन है, जल से जीवन साकार है। जिस रंग में घोल दो, उसी रंग में रंग जाता, जिस पात्र में डालो,उसी का ले लेता आकार है। नमक डालो तो खारा, शहद घोलो तो मीठा, जल की बूंदों से सागर,जल ही नदियों की धार है। समंदर में गिरे तो खारा,गंगा में हो जाता गंगाजल, कुएँ मे गिरे तो मीठा, नाली में गिरे तो बेकार है। पर जहाँ भी गिरता, जिससे भी जल मिलता, बस वही उसका अपना, हो जाता संसार है। पर उसका मूल स्वरूप, होता है रंगहीन स्वादहीन, वही जीवन रक्षक पानी, जो उसका मूलाधार है। अंत में वह अपने, मूल स्वरूप को पा ही जाता है, बस उसी दृष्टांत से हम,मनुष्यों का भी सरोकार है।  जब ...