मैं भी रचनाकार
. ।। मैं भी रचनाकार ।।
✍️ विरेन्द्र शर्मा (रायपुर)
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मेरी रचनाएं अब, लेने लगीं आकार है,
जल ही मेरी प्रेरणा, जल ही मेरा आधार है।
जल तो जल है, न कोई रंग ना स्वाद,
जल ही जीवन है, जल से जीवन साकार है।
जिस रंग में घोल दो, उसी रंग में रंग जाता,
जिस पात्र में डालो,उसी का ले लेता आकार है।
नमक डालो तो खारा, शहद घोलो तो मीठा,
जल की बूंदों से सागर,जल ही नदियों की धार है।
समंदर में गिरे तो खारा,गंगा में हो जाता गंगाजल,
कुएँ मे गिरे तो मीठा, नाली में गिरे तो बेकार है।
पर जहाँ भी गिरता, जिससे भी जल मिलता,
बस वही उसका अपना, हो जाता संसार है।
पर उसका मूल स्वरूप, होता है रंगहीन स्वादहीन,
वही जीवन रक्षक पानी, जो उसका मूलाधार है।
अंत में वह अपने, मूल स्वरूप को पा ही जाता है,
बस उसी दृष्टांत से हम,मनुष्यों का भी सरोकार है।
जब हम जन्म लेते है,तब हम एक निर्मल जल,
की तरह एक मुक्त पवित्र, विशुद्ध इंसान होते है।
जिस जाति परिवार,जिस घर में हम जन्म लेते,
वही हमारी जाति परिवार, हमारा घर हो जाता।
जो उनका धर्म है वही, हमारा भी धर्म हो जाता,
जो भाषा वो बोलते हैं, वही हमारी भाषा हो जाती।
जिस वर्ण जाति धर्म क्षेत्र, कर्म में हमें ढाला जाता,
जैसी शिक्षा दीक्षा होतीं, हम उसी में ढल जाते।
तब हम एक हिंदू मुसलमान,सिक्ख या ईसाई होते,
तब हम कोई ब्राह्मण शुद्र,क्षत्रिय वैष्य या नाई होते।
जिस देश में हम पैदा होते,वही हमारा वतन होता,
वही हमारा फिर अहले वतन,हमारा चमन होता।
तब हम हिन्दुस्तानी,पाकिस्तानी इंग्लिस्तानी होते,
तब हम किसी का पुत्र, बहन या भाई होते।
जिस काल में हम अपने,स्वरूप को जान लेते हैं,
विविधताओं से परे,एक इंसान हैं ये मान लेते हैं।
जिसका स्वामी एक पवित्र,अविनाशी आत्मा है,
उसके हृदय में सदा से,विद्यमान स्वयं परमात्मा है।
जब जान जाते हैं,कि मानवता ही सनातन धर्म है,
सभी जीवों से प्रेम और,उनकी सेवा ही सत्कर्म है।
परमात्मा परम प्राप्य लक्ष्य,जो अनेक नही एक हैं,
वही सबके परवरदिगार, पालन करता नेक हैं।
इस जग के रचनाकार का,मै एक छोटा आकार हूं,
उन्हीं का अंश साकार हूं,मैं भी एक रचनाकार हूं।
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